जम्मू-हरियाणा में चल रहे सियासी दंगल के बीच मोदी सरकार ने सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक चला है. वन नेशन-वन इलेक्शन के प्रस्ताव को मोदी कैबिनेट द्वारा मंजूरी दे दी गई है. जिसे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कमेटी ने मोदी कैबिनेट को सौंपा था, बता दें कि PM मोदी लंबे समय से वन नेशन वन इलेक्शन की वकालत करते आए हैं. पीएम मोदी ने कहा था कि ‘मैं एक राष्ट्र एक चुनाव के संकल्प को हासिल करने के लिए सभी से एक साथ आने का अनुरोध करता हूं, जो कि समय की मांग है.’ जिस पर अमल करते हुए सरकार ने अब अहम कदम उठाया है. हालांकि ये पहली बार नहीं हो रहा है इससे पहले भी वन नेशन वन इलेक्शन के जरिए देश में चुनाव हुए है. इतना ही नहीं आजादी के वक्त का भी इससे इससे नाता भी जुड़ा हुआ है. जिसके बारे में इस रिपोर्ट में हम आपको बताते हैं.
देश में साल 1951-52 में पहला चुनाव हुआ
दरअसल 1947 में मिली आजादी के बाद भारत में 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ ही हुए थे. देश में साल 1951-52 में पहला चुनाव हुआ था. इस दौरान भी राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ ही कराए गए थे. साल 1957, 1962 और 1967 में भी लगातार 4 बार देश में लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ ही हुए थे. देश में लगातार चार बार एक साथ चुनाव होने के बाद 1967 से इसका पैटर्न बदलने लगा. साल 1967 में UP में विधानसभा चुनाव हुए. जिसमें कांग्रेस पार्टी को बहुमत नहीं मिला. तब राज्य में 423 सीटें थी और कांग्रेस के खाते में 198 सीटें हीं आईं थी जबकि सरकार बनाने के लिए 212 सीटों की जरुरत होती थी. दूसरे नंबर पर जनसंघ पार्टी थी जिसे 97 सीटें मिली थीं लेकिन 37 निर्दलीय सदस्यों और कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिलकर कांग्रेस ने सरकार बना ली और सीपी गुप्ता मुख्यमंत्री बने.
मोदी सरकार ने वन नेशन वन इलेक्शन को मंजूरी देकर किया खेला
वहीं सीपी गुप्ता की सरकार एक महीने में ही चौधरी चरण सिंह की बगावत के चलते गिर गई. इसके बाद भारतीय जनसंघ और संयुक्त समाजवादी के साथ मिलकर चौधरी चरण सिंह ने सरकार बना ली लेकिन एक साल बाद ही गठबंधन में अनबन के चलते चौधरी चरण सिंह ने भी इस्तीफा दे दिया और विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर दी. धीरे-धीरे ये सिलसिला कई और राज्यों में भी शुरू हो गया. देश में 1967 में एक साथ चुनाव हुए थे ऐसे में 1972 में आम चुनाव होना था लेकिन इंदिरा गांधी ने समय से पहले 1971 में ही आम चुनाव कराने का फैसला किया. जिसके चलते एक देश एक चुनाव की जो व्यवस्था चली आ रही थी उस पर ब्रेक लग गया लेकिन अब फिर से मोदी कैबिनेट ने वन नेशन वन इलेक्शन की रिपोर्ट को मंजूरी देकर सबसे बड़ा खेला कर दिया है. जिसने फिर से सियासी तूफान खड़ा कर दिया है.