बांग्लादेश में क्यों सबको याद आ गया 1971 का इतिहास, क्या है आरक्षण का पूरा मामला, समझें इस रिपोर्ट में

4 अगस्त को बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन एक बार फिर उग्र हो गया। इस हिंसक आंदोलन के चलते 300 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। हिंसा को रोकने के लिए देश में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई, देश में कर्फ्यू लगा दिया गया। हिंसक प्रदर्शनों के चलते सरकार ने तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी घोषित कर दी। इन सब के बाद हालात काबू में नहीं आ सके। हालात इतने बेकाबू हो गए कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को इस्तीफा दे दिया है। जिसके बाद पीएम शेख हसीना भारत आ गई हैं। वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया है। वहीं देश के हालातों को लेकर बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने बयान जारी कर प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की है।

अब तक क्या-क्या हुआ?

4 अगस्त को हुई हिंसा में करीब 100 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाईं, जिसके चलते ये मौतें हुईं। रविवार को हुई मौतों की संख्या, जिसमें कम से कम 14 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। यह आंकड़ा बांग्लादेश के हाल के इतिहास में किसी भी विरोध प्रदर्शन में एक दिन में सबसे अधिक है। बताया गया कि रविवार की दोपहर कुछ लोगों ने थाने पर आकर हमला कर दिया। कुछ जगहों पर सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प भी हुई है। कुछ जगहों पर अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और नेताओं की मौत भी हुई है। रविवार शाम से पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया, रेलवे ने अपनी सेवाएं निलंबित कर दीं और देश का वस्त्र उद्योग बंद कर दिया गया। सरकार ने रविवार को शाम छह बजे से अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा की और सोमवार से तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी की भी घोषणा की। मोबाइल ऑपरेटरों ने बताया कि हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दूसरी बार सरकार ने हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप भी ब्रॉडबैंड कनेक्शन के जरिए उपलब्ध नहीं हैं। जुलाई में छात्र समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू करने के बाद हुई हिंसा में 300 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए हैं।

जून महीने के अंत से शुरू हुए बांग्लादेश में प्रदर्शन

साल 1971 जब मुक्ति संग्राम के बाद बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी मिली। इसके एक साल बाद 1972 में बांग्लादेश की सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इसी आरक्षण के विरोध में बांग्लादेश में प्रदर्शन हो रहे हैं। ये विरोध जून महीने के अंत में शुरू हुआ था तब यह हिंसक नहीं था। हालांकि मामला तब बढ़ गया जब इन विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग सड़क पर उतर आए। ढाका विश्वविद्यालय में 15 जुलाई को छात्रों की पुलिस और सत्तारूढ़ अवामी लीग समर्थित छात्र संगठन से झड़प हुई। इस घटना में कम से कम 100 लोग घायल हो गए। जिसके अगले दिन भी बांग्लादेश में हिंसा जारी रही और कम से कम 6 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद 16 और 17 जुलाई को भी झड़पें हुईं और प्रमुख शहरों की सड़कों पर गश्त करने के लिए अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया। इसके अगले दिन 18 जुलाई 19 लोगों की मौत हो गई। जबकि 19 जुलाई को 67 लोगों की जान चली गई। इस तरह से इस हिंसक आंदोलन के चलते अब तक 300 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

1972 के आरक्षण को लेकर अब क्यों हो रहे प्रदर्शन?

1972 से जारी इस आरक्षण व्यवस्था को 2018 में सरकार ने समाप्त कर दिया था। जून में उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों के लिए इस आरक्षण प्रणाली को फिर से बहाल कर दिया। कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने के फैसले को भी गैर कानूनी बताया था। कोर्ट के आदेश के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हालांकि, बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सरकार की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को निलंबित कर दिया और मामले की सुनवाई के लिए 7 अगस्त की तारीख तय कर दी। वहीं इस मामले ने तूल तब पकड़ा जब प्रधानमंत्री हसीना ने अदालती कार्यवाही का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों की मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया। सरकार के इस कदम के चलते छात्रों ने अपना विरोध तेज कर दिया। प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को ‘रजाकार’ की संज्ञा दी। दरअसल, बांग्लादेश के संदर्भ में रजाकार उन्हें कहा जाता है जिन पर 1971 में देश के साथ विश्वासघात करके पाकिस्तानी सेना का साथ देने के आरोप लगा था।

क्या है बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था?

बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बिंदु है। इस व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण का प्रावधान था। 1972 में शुरू की गई बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था में तब से कई बदलाव हो चुके हैं। 2018 में जब इसे खत्म किया गया, तो अलग-अलग वर्गों के लिए 56% सरकारी नौकरियों में आरक्षण था। समय-समय पर हुए बदलावों के जरिए महिलाओं और पिछड़े जिलों के लोगों को 10-10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी तरह पांच फीसदी आरक्षण धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए और एक फीसदी दिव्यांग कोटा दिया गया। हालांकि, हिंसक आंदोलन के बीच 21 जुलाई को बांग्लादेश के शीर्ष न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अधिकतर आरक्षण खत्म कर दिया।

क्या दिया आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला?

21 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत सभी सिविल सेवा नौकरियों के लिए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय में, यह निर्धारित किया गया कि अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों या दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी। वहीं बाकी बचे पदों के लिए अदालत ने कहा कि ये योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए खुले होंगे। यानी 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होंगी।

 

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra