देश में नेशनल हाईवे की लंबाई कुल सड़क नेटवर्क का करीब 2 फीसदी है, लेकिन सड़क हादसों में इनकी हिस्सेदारी काफी ज्यादा है। सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सामने आए आंकड़ों ने हाईवे की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। चौड़ी और बेहतर सड़क होने के बावजूद यहां तेज रफ्तार, भारी वाहनों और ट्रैफिक की वजह से हादसे ज्यादा गंभीर हो जाते हैं।
2025 में हाईवे पर 57 हजार मौतें
सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, 2025 में देशभर में सड़क हादसों में करीब 1.83 लाख लोगों की मौत हुई। इनमें 57,482 मौतें नेशनल हाईवे पर दर्ज की गईं। इससे पहले 2024 में देश में करीब 4.73 लाख सड़क हादसे हुए थे और करीब 1.70 लाख लोगों की जान गई थी। इनमें 52,600 से ज्यादा मौतें नेशनल हाईवे पर हुई थीं।
तेज रफ्तार सबसे बड़ा खतरा
हाईवे पर हादसों की गंभीरता की सबसे बड़ी वजहों में तेज रफ्तार शामिल है। 2022 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उस साल देश में 1,19,904 मौतें ओवरस्पीडिंग से जुड़ी थीं। इसके अलावा गलत दिशा में वाहन चलाना और शराब पीकर ड्राइविंग भी गंभीर हादसों की वजह बनते हैं। हाईवे पर ज्यादा गति के कारण छोटी गलती भी जानलेवा बन सकती है।
ब्लैक स्पॉट भी बड़ी परेशानी
नेशनल हाईवे पर ऐसे कई स्थान हैं, जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं। इन्हें ब्लैक स्पॉट कहा जाता है। मार्च 2025 तक देश के हाईवे पर 13,795 ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए थे, जिनमें 5,036 जगहों पर स्थायी सुधार पूरा हो चुका था। सुरक्षा के लिए क्रैश बैरियर, साइन बोर्ड, रोड मार्किंग, डिवाइडर और सड़क डिजाइन में बदलाव जैसे उपाय किए जाते हैं।
सिर्फ ड्राइवर जिम्मेदार नहीं
सड़क हादसे के लिए सिर्फ ड्राइवर की गलती को जिम्मेदार मानना पूरी तस्वीर नहीं है। खराब मौसम, वाहन की स्थिति, सड़क का डिजाइन, रोशनी, साइनेज और सड़क किनारे खड़े वाहन भी जोखिम बढ़ाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने NHAI से हाईवे पर खड़े वाहनों की निगरानी के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को लेकर सवाल किया है। हादसे के बाद एंबुलेंस और मेडिकल मदद कितनी जल्दी मिलती है, यह भी अहम है।
बढ़ता हाईवे नेटवर्क, बढ़ती चुनौती
देश का नेशनल हाईवे नेटवर्क 2014 में करीब 91,287 किलोमीटर था, जो 2024 के अंत तक बढ़कर 1,46,195 किलोमीटर हो गया। यानी करीब एक दशक में नेटवर्क लगभग 60 फीसदी बढ़ा। चार लेन या उससे ज्यादा वाले हाईवे भी तेजी से बढ़े हैं। इससे सफर और कनेक्टिविटी बेहतर हुई, लेकिन तेज ट्रैफिक के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। अब चुनौती सिर्फ सड़कें बनाने की नहीं, उन्हें सुरक्षित रखने की भी है।