ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जन्म कुंडली में सूर्य का राहु या केतु के साथ विशेष संबंध बनने पर पितृ दोष माना जाता है। इसे पितरों से जुड़े कर्मों और पितृ ऋण से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म करने से पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जा सकती है। हालांकि, पितृ दोष ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं का विषय है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
पितृ दोष से जुड़ी परेशानियां
ज्योतिष में पितृ दोष को जीवन में आने वाली कई तरह की रुकावटों से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार इसके कारण विवाह में देरी, संतान से जुड़ी चिंता, नौकरी या कारोबार में परेशानी और आर्थिक अस्थिरता जैसी स्थितियां हो सकती हैं। परिवार में तनाव और काम बनते-बनते रुक जाने को भी कई बार इससे जोड़कर देखा जाता है। इन बातों को धार्मिक मान्यताओं के तौर पर ही समझना चाहिए।
पितरों का तर्पण करना माना जाता है जरूरी
पितृ दोष से जुड़े धार्मिक उपायों में पितरों का तर्पण प्रमुख माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान तिल और जल से तर्पण करने की परंपरा है। इस दौरान पितरों का स्मरण करके उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किया गया तर्पण पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है।
मृत्यु तिथि पर श्राद्ध की परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पितर की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करना विशेष महत्व रखता है। श्राद्ध के साथ तर्पण और पिंडदान भी किया जाता है। अगर किसी पितर की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है या उस दिन श्राद्ध नहीं हो पाया, तो सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। इसे ज्ञात और अज्ञात पितरों के लिए महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या
साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी। यह पितृपक्ष की अंतिम तिथि मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन उन पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। परिवार की परंपरा के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन कराने और दान-पुण्य करने की भी मान्यता है।
गाय-कौवे को भोजन, पीपल की पूजा
पितृपक्ष में गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा पीपल के पेड़ की पूजा और उसके नीचे दीपक जलाने की भी धार्मिक मान्यता है। इन उपायों का उद्देश्य श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना माना जाता है।