Iran War से दुनिया में महंगा हुआ पेट्रोल, फिर भारत में कीमतें कम क्यों बढ़ीं? समझिए सरकार और रूस कनेक्शन

ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनियाभर के तेल बाजार को प्रभावित किया है। कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ने से कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव आया है। भारत में भी इसका असर पड़ा, लेकिन सरकार के कदमों और तेल की खरीद रणनीति के कारण घरेलू पंप कीमतों पर इसका असर कुछ हद तक सीमित रहा। मार्च 2026 में कच्चा तेल करीब 70 डॉलर से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।

सरकार ने टैक्स का बोझ कम किया

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत सिर्फ कच्चे तेल के दाम से तय नहीं होती। इसमें केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी, राज्य का वैट और अन्य शुल्क भी शामिल होते हैं। मार्च में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उछाल के बाद केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाई। सरकार के मुताबिक, इस कदम का उद्देश्य तेल कंपनियों पर बढ़ी लागत और अंडर-रिकवरी का कुछ बोझ कम करना था, ताकि खुदरा कीमतों में तत्काल तेज बढ़ोतरी न हो।

रूस से बढ़ी तेल खरीद बनी बड़ी मदद

भारत को संकट के दौरान रूस से मिलने वाले क्रूड का भी फायदा मिला। पश्चिम एशिया से सप्लाई में अनिश्चितता बढ़ने के बीच भारतीय रिफाइनरों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई। जुलाई 2026 में रूस से भारत का क्रूड आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक, उस महीने रूस भारत के कुल क्रूड आयात का आधे से ज्यादा हिस्सा उपलब्ध करा रहा था। रूसी तेल पर उपलब्ध छूट ने भी भारतीय रिफाइनरों के लिए इसे आकर्षक बनाया।

मजबूत रिफाइनिंग क्षमता का भी फायदा

भारत की बड़ी रिफाइनरियां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं। इससे देश के पास अलग-अलग स्रोतों से क्रूड खरीदने और जरूरत के हिसाब से फ्यूल तैयार करने की क्षमता रहती है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में सप्लाई बाधित होने पर भारत ने रूस समेत दूसरे देशों से खरीद बढ़ाई। हालांकि, भारत अपनी जरूरत के 90 फीसदी से ज्यादा कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर है। इसलिए लंबे समय तक महंगा क्रूड रहने पर देश के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।

अमेरिका और चीन पर क्यों अलग असर

अलग-अलग देशों में पेट्रोल की कीमतों पर वैश्विक तेल संकट का असर एक जैसा नहीं होता। अमेरिका में खुदरा ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय क्रूड और रिफाइंड फ्यूल बाजार से ज्यादा सीधे प्रभावित हो सकती हैं। चीन में भी पश्चिम एशिया की सप्लाई बाधित होने से तेल बाजार पर दबाव बढ़ा है। भारत में सरकारी टैक्स नीति, तेल कंपनियों की कीमत व्यवस्था और अलग-अलग देशों से क्रूड खरीदने की रणनीति ने असर को कुछ हद तक सीमित किया है।

खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं

भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन ग्लोबल तेल संकट खत्म नहीं हुआ है। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है, होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से सप्लाई प्रभावित रहती है या रूसी तेल पर मिलने वाली छूट घटती है, तो भारत की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और सरकार के वित्तीय बोझ पर पड़ सकता है। जुलाई में ही भारत का क्रूड आयात बिल सालाना आधार पर 41 फीसदी बढ़कर 13.7 अरब डॉलर पहुंच गया था।

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Author: The Hindi Post