बहुजन समाज पार्टी में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा 2027 के चुनाव की तैयारियों से ज्यादा मायावती के उत्तराधिकारी को लेकर है। पिछले कुछ समय में आकाश आनंद, ईशान आनंद और दीपिका आनंद के नाम सामने आए और पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर फैसले बदले। 20 सितंबर 2026 को मायावती ने फिर स्पष्ट किया कि ईशान आनंद को संगठन में जिम्मेदारी दी जाएगी, जबकि आकाश और दीपिका को पार्टी की जिम्मेदारियों से दूर रखा जाएगा।
मायावती की पकड़ अब भी मजबूत
बसपा की चुनावी ताकत पिछले वर्षों में जरूर घटी है, लेकिन पार्टी पर मायावती का नियंत्रण बना हुआ है। 2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इसके बाद विधानसभा चुनावों में पार्टी की सीटें लगातार कम हुईं और 2022 में वह सिर्फ एक सीट पर रह गई। चुनाव आयोग के आंकड़े भी इस लंबे बदलाव को दर्ज करते हैं।
2027 से पहले उत्तराधिकारी की चर्चा
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में बसपा की चुनावी रणनीति और संगठन विस्तार के साथ नेतृत्व का सवाल भी अहम हो गया है। हालिया घटनाक्रम में मायावती ने परिवार के भीतर राजनीतिक जिम्मेदारी को लेकर कई बार अपना रुख बदला है। 12 सितंबर को उन्होंने आकाश और ईशान को पार्टी पद से दूर रखने और जरूरत पड़ने पर दीपिका की मदद लेने की बात कही थी।
फिर ईशान आनंद को मिली जिम्मेदारी
20 सितंबर को मायावती ने अपने फैसले में फिर बदलाव किया। उन्होंने कहा कि आकाश आनंद और दीपिका आनंद को पार्टी में जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी, जबकि ईशान आनंद को संगठन में सम्मानजनक भूमिका दी जाएगी। इस बदलाव के बाद बसपा के भीतर परिवार से जुड़े नेतृत्व के सवाल पर चर्चा और तेज हो गई है। 23 सितंबर की बैठक में संगठन और चुनावी तैयारियों से जुड़े फैसलों की घोषणा भी प्रस्तावित है।
कभी उत्तर प्रदेश में था बसपा का दबदबा
बसपा का सबसे मजबूत दौर 2007 का विधानसभा चुनाव रहा, जब पार्टी ने 403 में 206 सीटें जीतीं। 2012 में सीटें घटकर 80 हुईं और वोट शेयर 25.95 प्रतिशत रहा। 2017 में पार्टी 19 सीटों और 22.23 प्रतिशत वोट पर आ गई। 2022 में उसे सिर्फ एक सीट मिली और वोट शेयर 12.88 प्रतिशत रह गया।
लोकसभा चुनावों में भी बदली तस्वीर
लोकसभा चुनावों में भी बसपा के प्रदर्शन में बड़ा बदलाव आया। 2009 में पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 20 सीटें जीती थीं। 2014 में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी, हालांकि उसका वोट शेयर करीब 19.77 प्रतिशत रहा। 2019 में सपा के साथ गठबंधन में बसपा ने 10 सीटें जीतीं। 2024 में पार्टी अकेले चुनाव लड़ी और 80 सीटों में एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसका वोट शेयर 9.39 प्रतिशत रहा।
पार्टी कमजोर, नेतृत्व का सवाल कायम
बसपा के घटते चुनावी प्रदर्शन के पीछे सामाजिक समीकरणों में बदलाव, दूसरे दलों का विस्तार और नए राजनीतिक चेहरों का उभरना जैसे कई कारण बताए जाते हैं। वहीं मायावती लगातार पार्टी की कमान अपने हाथ में रखती रही हैं। ऐसे में उत्तराधिकारी का सवाल सिर्फ परिवार का मामला नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य के संगठनात्मक ढांचे से भी जुड़ गया है।
तीन नामों के बीच अटका सवाल
आकाश आनंद को पहले आगे बढ़ाया गया, फिर उन्हें पार्टी की जिम्मेदारियों से हटाया गया। इसके बाद ईशान का नाम सामने आया और फिर दीपिका को संभावित जिम्मेदारी देने की बात कही गई। अब ईशान को फिर आगे बढ़ाने का फैसला सामने आया है। मायावती ने परिवारवाद से दूरी और पार्टी हित को प्राथमिकता देने की बात कही है, लेकिन हालिया घटनाक्रम में नेतृत्व की चर्चा बार-बार उनके भाई आनंद कुमार के बच्चों के इर्द-गिर्द ही रही है।