स्मार्टफोन अब सिर्फ कॉल और मैसेज का साधन नहीं रहा। नोटिफिकेशन, ऐप्स का डिजाइन और फोन चेक करने की आदत मिलकर हमारा ध्यान बार-बार भटका सकती है। हैरानी की बात यह है कि कई बार फोन इस्तेमाल किए बिना भी उसका पास होना फोकस पर असर डाल सकता है। यानी स्क्रीन बंद होने के बावजूद दिमाग फोन की मौजूदगी को नोटिस करता रह सकता है।
फोन दूर हुआ तो टेस्ट बेहतर
2017 में टेक्सास यूनिवर्सिटी के मैककॉम्ब्स स्कूल ऑफ बिजनेस के असिस्टेंट प्रोफेसर एड्रियन वार्ड और उनकी टीम ने करीब 800 स्मार्टफोन यूजर्स पर प्रयोग किया। लोगों से कॉग्निटिव टेस्ट करवाए गए और उनके फोन को टेबल, जेब या बैग और दूसरे कमरे में रखा गया। जिन लोगों का फोन दूसरे कमरे में था, उन्होंने टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन किया। रिसर्चर्स ने इसे ‘ब्रेन ड्रेन इफेक्ट’ कहा।
नोटिफिकेशन दिमाग को खींचते हैं
मैसेज, सोशल मीडिया, ईमेल, न्यूज या शॉपिंग ऐप का अलर्ट आते ही ध्यान चल रहे काम से हट सकता है। जरूरी न होने पर भी दिमाग जानना चाहता है कि नोटिफिकेशन में आखिर आया क्या है। इसी तरह लगातार स्क्रॉल होने वाली फीड, ऑटो-प्ले वीडियो और लाल नोटिफिकेशन बैज हमें ऐप पर ज्यादा समय बिताने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
आदत बन जाता है फोन चेक करना
कई बार फोन किसी जरूरी काम के लिए नहीं, बल्कि बोरियत या खाली समय में हाथ में आता है। काम मुश्किल लगा या कुछ सेकंड खाली मिले, तो हम फोन चेक करने लगते हैं। धीरे-धीरे यह किसी नोटिफिकेशन का जवाब देने के बजाय एक ऑटोमैटिक हैबिट बन सकती है। 2023 की एक स्टडी में भी फोन सामने होने पर अटेंशन और काम की गति में कमी देखी गई।
भारत में बढ़ रहा फोन का इस्तेमाल
भारत में फोन से दूरी बनाना आसान नहीं है। सरकार के कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे टेलीकॉम 2025 के मुताबिक, 85.5 फीसदी भारतीय घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है। EY की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारतीयों ने 2025 में स्मार्टफोन पर करीब 1.23 ट्रिलियन घंटे बिताए, जो 2024 के मुकाबले करीब 9 फीसदी ज्यादा था। इनमें लगभग 59 फीसदी समय मीडिया और एंटरटेनमेंट में गया।
फोकस चाहिए तो फोन दूर रखें
फोन छोड़ना संभव नहीं है, लेकिन उसके डिस्ट्रैक्शन कम किए जा सकते हैं। गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद करें, सोशल मीडिया ऐप्स को होम स्क्रीन से हटाएं और काम या पढ़ाई के दौरान फोन को टेबल से दूर रखें। बार-बार चेक करने के बजाय फोन देखने का तय समय रखें। आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हम फोन कितने घंटे इस्तेमाल करते हैं, बल्कि यह भी है कि वह हमारा ध्यान कितनी बार तोड़ता है। स्मार्टफोन दिन-ब-दिन स्मार्ट हो रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इसकी कीमत हमारी अपनी अलर्टनेस चुका रही है?