धार्मिक मान्यता के अनुसार, कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पहले भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हल षष्ठी मनाई जाती है। इसे बलराम जयंती, ललही छठ और हर छठ के नाम से भी जाना जाता है। साल 2026 में षष्ठी तिथि 2 सितंबर सुबह 6:12 बजे शुरू होकर 3 सितंबर सुबह 4:25 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 2 सितंबर को रखा जाएगा।
संतान की लंबी उम्र के लिए खास व्रत
हल षष्ठी का व्रत खासतौर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना से रखती हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से भगवान बलराम का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन महिलाएं पूजा-पाठ करके अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं।
संतान सुख के लिए भी मानी जाती है फलदायी
धार्मिक मान्यताओं में हल षष्ठी को संतान सुख की कामना के लिए भी महत्वपूर्ण बताया गया है। जिन दंपतियों को अभी संतान की प्राप्ति नहीं हुई है, वे भी इस दिन भगवान बलराम और हल षष्ठी माता की पूजा कर सकते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से पूजा और व्रत करने पर संतान संबंधी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है।
पूजा में ये चीजें चढ़ाने की परंपरा
हल षष्ठी की पूजा में भगवान बलराम और हल षष्ठी माता का स्मरण किया जाता है। पूजा में कुमकुम, चंदन, फूल, फल, सुपारी, अक्षत और सिक्का अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद धूप और दीप जलाकर पूजा की जाती है। कई जगह पूजा के दौरान हल षष्ठी की कथा सुनने की भी परंपरा है।
चंद्रोदय के बाद पूरा होता है व्रत
मान्यताओं के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएं कथा सुनने के बाद चंद्रोदय तक नियमों का पालन करती हैं। कुछ परंपराओं में इस दौरान जल ग्रहण न करने और भूमि पर न बैठने की मान्यता भी बताई गई है। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रत पूर्ण माना जाता है और महिलाएं पारण करती हैं।
सतनाजा बच्चों में बांटने की परंपरा
पूजा पूरी होने के बाद भुना हुआ सतनाजा बच्चों को प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा कई जगह देखने को मिलती है। सतनाजा को अलग-अलग अनाज और उनसे जुड़े पदार्थों का मिश्रण माना जाता है। हल षष्ठी पर इसे प्रसाद के तौर पर बांटना पर्व की खास परंपराओं में शामिल है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा और व्रत के नियमों में थोड़ा अंतर हो सकता है।