नेपाल में आई बाढ़ ने इसलिए भी हैरान किया क्योंकि उस दिन इलाके में कोई खास बारिश नहीं हुई थी। न बादल फटा और न आसमान से इतनी मात्रा में पानी गिरा। इसके बावजूद नदियों में अचानक पानी बढ़ गया और कुछ ही समय में भारी तबाही मच गई। यही वजह है कि वैज्ञानिक अब इसके पीछे ग्लेशियर टूटने की आशंका की जांच कर रहे हैं।
4.4 की कंपन ने बढ़ाया रहस्य
शुरुआत में माना गया कि 4.4 तीव्रता का भूकंप ग्लेशियर झील या पहाड़ की चट्टानों को हिला सकता है। लेकिन अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण यानी USGS के मुताबिक वहां कंपन जरूर रिकॉर्ड हुई, लेकिन वह सामान्य भूकंप नहीं था। वैज्ञानिकों की एक संभावना है कि बड़े ग्लेशियर या बर्फ-पत्थर के हिस्से के टूटकर गिरने से जमीन में इतनी तेज कंपन पैदा हुई हो।
ग्लेशियर आखिर टूटता कैसे है?
ग्लेशियर पहाड़ों पर वर्षों तक जमा हुई बर्फ की मोटी परत से बनता है। तापमान बढ़ने पर इसकी ऊपरी बर्फ तेजी से पिघलती है। यह पानी दरारों के अंदर पहुंच सकता है और बर्फ व चट्टानों के बीच पकड़ कमजोर कर सकता है। ज्यादा गर्मी और बढ़ते दबाव के कारण ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिर सकता है।
तिब्बत में टूटा बर्फ-पत्थर का पहाड़
सैटेलाइट तस्वीरों से वैज्ञानिकों ने करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के संकेत देखे हैं। बताया जा रहा है कि करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में बर्फ, पत्थर और मिट्टी का बड़ा हिस्सा गिरा। इसे ‘आइस-रॉक एवलांच’ कहा जाता है। यह घटना नेपाल-चीन सीमा के पास तिब्बत की ल्हेन्दे नदी क्षेत्र में बताई जा रही है।
नदी में मलबा गिरा, फिर आया सैलाब
इतना बड़ा मलबा नदी में गिरने के बाद पानी अचानक उफन सकता है। दूसरी संभावना यह है कि मलबे ने नदी का रास्ता कुछ समय के लिए रोक दिया और अस्थायी बांध बन गया। बांध टूटने पर पानी, कीचड़, पत्थर और बर्फ एक साथ नीचे की ओर तेजी से बह निकले। यही पानी नेपाल की भोटे कोशी और फिर त्रिशूली नदी तक पहुंचा, जहां करीब 30 मिनट में जलस्तर कई मीटर बढ़ने की बात सामने आई है।
असली चिंता ग्लोबल वॉर्मिंग की
इस घटना की पूरी तस्वीर वैज्ञानिक जांच के बाद ही साफ होगी। लेकिन ग्लेशियर का टूटना हिमालय के लिए गंभीर चेतावनी जरूर है। बढ़ता तापमान ग्लेशियरों को कमजोर कर रहा है और इससे ग्लेशियर झीलों, भूस्खलन और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। अगर ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं, तो हिमालय के नीचे बसे करोड़ों लोगों के लिए खतरा और बड़ा हो सकता है। इसलिए ग्लोबल वॉर्मिंग को अब भविष्य का नहीं, आज का संकट समझना होगा।