भारत ने स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी छलांग लगाई है। देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2% मोबाइल फोन अब भारत में ही बनते हैं। 2025 में स्मार्टफोन देश का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट प्रोडक्ट भी बन गया। लेकिन भारत की सबसे बड़ी कमी अब भी मजबूत ग्लोबल स्मार्टफोन ब्रांड की है।
सरकार का फोकस अब ब्रांड बनाने पर
सरकार ने इस कमी को दूर करने के लिए 62,500 करोड़ रुपये की नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम शुरू करने का प्लान बनाया है। इसका लक्ष्य सिर्फ फोन असेंबल करना नहीं, बल्कि भारत में डिजाइन, टेक्नोलॉजी और पेटेंट तैयार करना है। भारतीय कंपनियों को अपना ब्रांड खड़ा करने के लिए बिक्री पर 5% इंसेंटिव मिलेगा। इन-हाउस डिजाइन पर 3% अतिरिक्त फायदा भी दिया जाएगा।
दस साल पहले भारतीय कंपनियां थीं आगे
एक समय माइक्रोमैक्स, लावा और इंटेक्स जैसे भारतीय ब्रांड भारतीय बाजार में मजबूत स्थिति में थे। 2015 के आसपास इनकी कुल हिस्सेदारी करीब 35% तक पहुंच गई थी। लेकिन Xiaomi, Vivo और Oppo ने बेहतर स्पेसिफिकेशन, कम कीमत और मजबूत सप्लाई चेन के दम पर तेजी से बाजार पर कब्जा कर लिया। भारतीय कंपनियां रिसर्च, सॉफ्टवेयर और नए फीचर्स में पीछे रह गईं।
अब Lava को मिल सकती है बड़ी ताकत
नई स्कीम से लावा जैसे भारतीय ब्रांड को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। कंपनी ने बजट स्मार्टफोन सेगमेंट में दोबारा अपनी पकड़ मजबूत की है और उसकी हिस्सेदारी करीब 2% बताई जा रही है। लावा डिस्प्ले और कैमरा मॉड्यूल जैसे जरूरी हिस्सों में करीब 1,100 करोड़ रुपये निवेश करने की तैयारी में है। इससे कंपनी सिर्फ असेंबलिंग से आगे बढ़ सकती है।
Dixon जैसी कंपनियां देंगी ग्लोबल ताकत
भारत में अब मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है। डिक्सन टेक्नोलॉजी जैसी कंपनियां बड़े पैमाने पर फोन बनाने की क्षमता विकसित कर चुकी हैं। इससे भारतीय ब्रांड्स को ग्लोबल बाजार के लिए तेजी से उत्पादन करने में मदद मिल सकती है। वहीं, माइक्रोमैक्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी दोबारा उत्पादन शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
असली लड़ाई ग्राहक के भरोसे की होगी
फैक्ट्रियां और पैसा जुटाना आसान है, लेकिन ग्राहक का भरोसा जीतना सबसे मुश्किल काम होगा। Samsung और Xiaomi जैसे ब्रांड वर्षों से कैमरा, सॉफ्टवेयर और अपडेट के क्षेत्र में मजबूत हैं। इसलिए भारतीय कंपनियों को सिर्फ सस्ता फोन नहीं, बल्कि बेहतर अनुभव देना होगा। 2026-27 से शुरू होने वाली योजना की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब भारत का कोई ब्रांड ग्लोबल बाजार में अपनी अलग पहचान बना सके।