कावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु का विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। 17 अगस्त 2026 को कोर्ट ने कर्नाटक से कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के पानी छोड़ने संबंधी निर्देशों का पालन करने को कहा। तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक ने पानी छोड़ना शुरू किया, लेकिन उसका पर्याप्त हिस्सा अभी तक राज्य तक नहीं पहुंचा है।
कर्नाटक बोला, बेसिन में पानी की कमी
सुनवाई के दौरान कर्नाटक ने कहा कि कावेरी बेसिन में गंभीर जल संकट है और उपलब्ध पानी सीमित है। हालांकि, राज्य ने बताया कि सोमवार सुबह नदी का प्रवाह 12 हजार क्यूसेक से ऊपर पहुंच गया है। कर्नाटक ने इसे बनाए रखने का भरोसा भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई एक सप्ताह टालते हुए नए आंकड़ों के साथ स्थिति रिपोर्ट मांगी है।
विवाद की जड़ 1892 और 1924 में
कावेरी विवाद की शुरुआत आजादी से भी पहले हुई थी। 1892 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर रियासत के बीच पानी के इस्तेमाल को लेकर समझौते हुए। 1974 में 1924 समझौते की अवधि खत्म होने के बाद मतभेद बढ़े। 1990 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल बना और 2007 में उसका अंतिम अवॉर्ड आया।
2016 में पानी पर बढ़ा बड़ा टकराव
कमजोर मानसून के दौरान 2016 में विवाद फिर बेहद गंभीर हो गया। सुप्रीम कोर्ट को कर्नाटक से तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने की मात्रा कई बार तय करनी पड़ी। 5 सितंबर को 15 हजार क्यूसेक प्रतिदिन से शुरुआत हुई, जिसे बाद में 12 हजार, 6 हजार और फिर 2 हजार क्यूसेक किया गया। इससे दोनों राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ा।
2018 का फैसला, फिर बनी नई व्यवस्था
16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल बंटवारे पर बड़ा फैसला दिया। कर्नाटक का हिस्सा 14.75 TMC बढ़ाया गया और तमिलनाडु के लिए बिलिगुंडलु पर वार्षिक पानी 192 TMC से घटाकर 177.25 TMC किया गया। 18 मई को कोर्ट ने कावेरी जल प्रबंधन व्यवस्था को मंजूरी दी। इसके तहत CWMA और CWRC बनाए गए, ताकि पानी की निगरानी और वितरण हो सके।
असली पेच सूखे साल में पानी का
कावेरी विवाद की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हर साल बारिश और नदी का प्रवाह एक जैसा नहीं रहता। सामान्य साल के लिए बंटवारा तय है, लेकिन कम बारिश में पानी की कमी किस अनुपात में दोनों राज्यों को झेलनी होगी, इसे लेकर विवाद होता है। 2026 में भी यही सवाल सामने आया। तमिलनाडु खेती के लिए पानी मांगता है, जबकि कर्नाटक अपनी पेयजल और सिंचाई जरूरतों का हवाला देता है। यही वजह है कि अदालत और प्राधिकरण के आदेशों के बावजूद विवाद बार-बार लौट आता है।