Australia का यूरेनियम, भारत की नई ताकत! क्या चीन को घेरने के लिए बदल रही है दुनिया की पूरी रणनीति?

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब यह समझने लगी हैं कि किसी एक देश, खासकर चीन, पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन चुका है। हाल के वर्षों में रेयर अर्थ मिनरल्स और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर चीन की नीतियों ने कई देशों की चिंता बढ़ाई है। इसी वजह से अब कई देश सप्लाई चेन को विविध बनाने और भारत जैसे विकल्पों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं।

भारत क्यों है सबसे बड़ा विकल्प?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास बड़ी युवा आबादी, कुशल कार्यबल और तेजी से बढ़ता उद्योग क्षेत्र है। सरकार भी लंबे समय से देश को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि, इसके लिए सबसे बड़ी जरूरत लगातार और पर्याप्त बिजली की है। अगर भारत को चीन जैसी उत्पादन क्षमता हासिल करनी है, तो ऊर्जा उत्पादन में बड़ा विस्तार करना होगा।

परमाणु ऊर्जा की बढ़ती अहमियत

भारत में बिजली का बड़ा हिस्सा अभी भी कोयले से बनता है, जिससे प्रदूषण की समस्या भी जुड़ी है। सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं क्योंकि मौसम और समय के अनुसार उत्पादन बदलता रहता है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा को लगातार और बड़े पैमाने पर बिजली उपलब्ध कराने का मजबूत विकल्प माना जाता है। इसके लिए सबसे जरूरी ईंधन यूरेनियम होता है।

यूरेनियम पर क्यों था विवाद?

1968 की परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के बाद कई देशों ने परमाणु तकनीक और यूरेनियम के व्यापार पर सख्त नियम बना दिए थे। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए और बाद में 1974 तथा 1998 में परमाणु परीक्षण भी किए। इसके चलते लंबे समय तक भारत को यूरेनियम और परमाणु तकनीक हासिल करने में मुश्किलें आईं। हालांकि, 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद स्थिति धीरे-धीरे बदलने लगी।

ऑस्ट्रेलिया डील का बड़ा मतलब

ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नागरिक परमाणु सहयोग समझौता पहले हो चुका था, लेकिन अब दोनों देशों के बीच भरोसा और मजबूत हुआ है। माना जा रहा है कि यह सहयोग भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। इससे भारत परमाणु बिजली उत्पादन बढ़ा सकेगा और उद्योगों को स्थिर बिजली उपलब्ध कराने में आसानी होगी।

चीन को संतुलित करने की रणनीति

भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों का सहयोग केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं माना जा रहा। QUAD जैसे मंचों के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाने और चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने की कोशिश भी दिखाई देती है। अगर भारत को पर्याप्त ऊर्जा और संसाधन मिलते हैं, तो वह वैश्विक कंपनियों के लिए चीन का मजबूत विकल्प बन सकता है। यही वजह है कि इस समझौते को बदलते वैश्विक समीकरणों के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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Author: The Hindi Post