हिंदू धर्म में सालभर में 24 और पुरुषोत्तम मास में 26 एकादशी व्रत पड़ते हैं, लेकिन ज्येष्ठ माह की निर्जला एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इस साल यह व्रत 25 जून को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति पूरे वर्ष सभी एकादशी व्रत नहीं रख पाता, वह यदि श्रद्धा और नियमों के साथ निर्जला एकादशी का व्रत रखे तो उसे सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
महाभारत से जुड़ी है मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों में भीमसेन सभी एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। भीम ने इस व्रत को पूरी श्रद्धा से किया और उन्हें सभी एकादशी व्रतों का फल प्राप्त हुआ। तभी से इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है।
बिना जल के रखा जाता है व्रत
निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तिथि तक जल ग्रहण नहीं किया जाता। हालांकि, जिन लोगों की तबीयत ठीक न हो, बुजुर्ग हों या किसी बीमारी से पीड़ित हों, उन्हें अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत करना चाहिए।
ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ बेहद शुभ माना जाता है। रात में भजन-कीर्तन, कथा श्रवण और भगवान के नाम का स्मरण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और श्रीहरि की कृपा बनी रहती है।
दान का है विशेष महत्व
निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जल से भरा घड़ा, छाता, पंखा, वस्त्र, फल और शर्बत का दान करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
भूलकर भी न करें ये काम
इस दिन मांसाहार, शराब, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इसके अलावा क्रोध, झूठ, चुगली और विवाद करने से भी बचना चाहिए। जरूरतमंद और बुजुर्ग लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए। साथ ही निर्जला एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए और समय को व्यर्थ कार्यों में न गंवाकर भगवान के भजन और पूजा में लगाना चाहिए।