ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर होने के बावजूद हालात सामान्य नहीं हैं। दोनों देशों के बीच जुबानी हमले लगातार जारी हैं, जिससे स्थिति कभी शांत तो कभी बेहद तनावपूर्ण नजर आती है। एक दिन बातचीत और समझौते की उम्मीद बनती है, तो अगले ही दिन टकराव का खतरा बढ़ जाता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच सीधी वार्ता अटकी हुई है, जबकि अन्य देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है।
परमाणु मुद्दे पर अटका पेंच
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के तीन-चरणीय प्रस्ताव को खारिज कर दिया, क्योंकि उसमें संवर्धित यूरेनियम पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं थी। ईरान चाहता है कि पहले अमेरिका नाकाबंदी हटाए और उसके बाद बातचीत आगे बढ़े। वहीं अमेरिका की शर्त है कि परमाणु कार्यक्रम पर शुरुआत से ही स्पष्ट फैसला हो। इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी तरह से अटक गई है।
नाकाबंदी से बढ़ रहा दबाव
अमेरिका की ओर से लगाई गई नाकाबंदी का असर ईरान पर साफ दिख रहा है। तेल निर्यात रुकने की वजह से आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर नाकाबंदी जारी रही तो ईरान को अपने तेल के कुएं बंद करने पड़ सकते हैं, जिससे भविष्य में उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा। साथ ही जरूरी सामान और अनाज की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा है। ऐसे में ईरान पर समझौते का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ा हथियार
होर्मुज स्ट्रेट इस पूरे तनाव का सबसे अहम केंद्र बन चुका है। अमेरिका का मानना है कि ईरान इसे “आर्थिक हथियार” की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान इसे अपने दबाव बनाने के तरीके के रूप में देखता है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की नजरें अब इसी बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाएंगे या हालात और बिगड़ेंगे।