ईरान युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है। Reserve Bank of India के अनुसार इस साल रुपया एशिया की कमजोर मुद्राओं में शामिल रहा है और इसमें 3% से ज्यादा गिरावट आई है। रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा हो जाता है, खासकर पेट्रोल-डीजल, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकतर तेल विदेशों से खरीदता है।
RBI का ‘रेस्क्यू प्लान’ शुरू
हालात तब गंभीर हो गए जब डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के पार पहुंच गया। इसे संभालने के लिए RBI ने तुरंत कदम उठाए। केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल कंपनियों को निर्देश दिया कि वे खुले बाजार से सीधे डॉलर खरीदने से बचें। यह वही रणनीति है जो पहले वैश्विक संकट के समय अपनाई गई थी।
तेल कंपनियों के लिए नया तरीका
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को अब भारतीय स्टेट बैंक के जरिए डॉलर लेने को कहा गया है। इससे खुले बाजार में डॉलर की मांग कम होगी और रुपये पर दबाव घटेगा। यह कदम विदेशी मुद्रा के संतुलन को बनाए रखने के लिए उठाया गया है।
क्या अब सुधर रहे हालात?
RBI के इन सख्त कदमों का असर अब दिखने लगा है। बाजार में डॉलर की मांग कम हुई है और रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% तक मजबूत हुआ है। फिलहाल यह 93.20 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यही रणनीति जारी रही, तो रुपये को और मजबूती मिल सकती है।