पार्किंसंस बीमारी एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो धीरे-धीरे बढ़ती है और शरीर की मूवमेंट को प्रभावित करती है। यह बीमारी तब होती है जब दिमाग में डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाएं कमजोर या नष्ट होने लगती हैं। डोपामाइन शरीर के मसल्स को कंट्रोल करने और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह बीमारी सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं में भी देखने को मिल सकती है, इसलिए इसके लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है।
लिखावट और सूंघने में बदलाव
पार्किंसंस के शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जैसे अगर आपकी हैंडराइटिंग अचानक छोटी हो जाए या शब्द आपस में चिपके हुए लगने लगें, तो यह संकेत हो सकता है। इसके अलावा, सूंघने की क्षमता कम होना भी एक बड़ा लक्षण है। अगर आपको इलायची या फूल जैसी तेज खुशबू महसूस नहीं हो रही, तो इसे हल्के में न लें। ये बदलाव कई बार कंपकंपी शुरू होने से पहले ही दिखाई देने लगते हैं।
चेहरे और नींद से जुड़े संकेत
इस बीमारी में चेहरे के मसल्स पर भी असर पड़ता है। व्यक्ति का चेहरा भावहीन या गंभीर दिखने लगता है, भले ही वह अंदर से सामान्य हो। पलकें झपकने की संख्या भी कम हो सकती है। इसके साथ ही नींद से जुड़ी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं। जैसे सोते समय ज्यादा हिलना-डुलना, चिल्लाना या सपनों को वास्तविक रूप में जीना ये सभी संकेत पार्किंसंस की ओर इशारा कर सकते हैं।
पाचन से जुड़ी समस्याएं भी संकेत
पार्किंसंस का असर पाचन तंत्र पर भी पड़ता है। बार-बार कब्ज होना या पाचन की गति धीमी होना इसके शुरुआती लक्षणों में शामिल है। लोग इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह गंभीर संकेत हो सकता है। अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर पहचान और इलाज से इस बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।