ईरान से जुड़ा संघर्ष केवल दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि इसमें कई ताकतें शामिल हैं। पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मध्यस्थ वास्तव में निष्पक्ष है? क्योंकि इस पूरे समीकरण में इज़राइल भी एक अहम पक्ष है।
पाकिस्तान-इज़राइल के रिश्ते की सच्चाई
पाकिस्तान और इज़राइल के बीच कभी औपचारिक संबंध नहीं रहे। 1947-48 में जब संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के बंटवारे की बात हुई, तब मुहम्मद अली जिन्नाह ने इज़राइल के निर्माण का विरोध किया। इसके बाद से पाकिस्तान ने कभी इज़राइल को मान्यता नहीं दी। यहां तक कि पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भी लिखा होता है कि यह इज़राइल में मान्य नहीं है।
न्यूट्रल क्यों नहीं दिख पाता पाकिस्तान
पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया का समर्थक मानता है और फिलिस्तीन के मुद्दे को अपनी पहचान से जोड़ता है। ऐसे में इज़राइल के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। भले ही पाकिस्तान मध्यस्थ बनने की कोशिश करे, लेकिन इज़राइल उसे एक निष्पक्ष पक्ष के रूप में नहीं देखता। यही कारण है कि बातचीत में रुकावट बनी रहती है।
पुरानी कोशिशें भी नहीं हुई सफल
2005 में परवेज मुशर्रफ ने इज़राइल से संबंध सुधारने की कोशिश की थी और दोनों देशों के नेताओं के बीच मुलाकात भी हुई। लेकिन पाकिस्तान के अंदर भारी विरोध के चलते यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी। यही स्थिति आज भी बनी हुई है, जिससे साफ है कि पाकिस्तान चाहकर भी पूरी तरह न्यूट्रल नहीं बन सकता।