पाकिस्तान बलूचिस्तान के ग्वादर इलाके में स्थित जिवानी एयरबेस को फिर से विकसित करने में जुटा है। इस प्रोजेक्ट में चीन की सक्रिय भूमिका बताई जा रही है, जो आर्थिक मदद भी दे रहा है। यह कदम क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा रहा है।
लोकेशन बनाती है इसे खास
जिवानी एयरबेस की सबसे बड़ी ताकत इसकी लोकेशन है। यह होर्मुज स्ट्रेट के बेहद करीब और ईरान की सीमा से करीब 34 किमी दूर है। यह ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी के प्रमुख समुद्री मार्गों के पास स्थित है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है, ऐसे में यह एयरबेस समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बेहद अहम बन सकता है।
भारत के लिए क्यों चिंता बढ़ी
यह एयरबेस चाबहार पोर्ट के काफी करीब है, जिसे भारत ने विकसित किया है। चाबहार भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण जरिया है। अगर जिवानी एयरबेस पूरी तरह सक्रिय होता है, तो पाकिस्तान यहां से चाबहार पर नजर रख सकता है और संकट के समय भारत की सप्लाई लाइन पर दबाव बना सकता है।
चीन की रणनीति और बड़ा खेल
रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन इस एयरबेस को अपनी “String of Pearls” रणनीति का हिस्सा बना सकता है। इस रणनीति के तहत वह ग्वादर पोर्ट, हम्बनटोटा पोर्ट और जिबूती बेस जैसे ठिकानों के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। जिवानी एयरबेस इस नेटवर्क में एक नया लिंक बन सकता है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदलने की आशंका है।