NATO की शुरुआत 1949 में हुई थी, जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप पूरी तरह तबाह था। दूसरी तरफ सोवियत संघ तेजी से अपनी ताकत बढ़ा रहा था और कम्युनिस्ट विचारधारा फैला रहा था। ऐसे में यूरोप और अमेरिका ने मिलकर एक सैन्य गठबंधन बनाया, ताकि किसी एक पर हमला हो तो सभी मिलकर जवाब दें।
आर्टिकल 5 का असली मतलब
NATO का सबसे अहम नियम “आर्टिकल 5” है, जिसका मतलब है- एक देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा। यह नियम खास तौर पर सोवियत संघ को रोकने के लिए बनाया गया था। इससे यूरोप को सुरक्षा मिली और अमेरिका को वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का मौका मिला। यानी यह गठबंधन सिर्फ रक्षा नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत का भी जरिया था।
अमेरिका को क्या मिला
यह कहना गलत होगा कि NATO से सिर्फ यूरोप को फायदा हुआ। अमेरिका को इससे बहुत बड़ा आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिला। उसे यूरोप में सैन्य ठिकाने मिले, जिससे वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पकड़ मजबूत कर सका। इसके अलावा, खुला बाजार मिला जिससे व्यापार और हथियारों की बिक्री तेजी से बढ़ी। इसी वजह से अमेरिका धीरे-धीरे सुपरपावर बन गया।
यूरोप ने भी निभाया साथ
इतिहास में सिर्फ एक बार आर्टिकल 5 लागू हुआ, और वह भी अमेरिका के लिए। 2001 में 9/11 हमले के बाद NATO देशों ने अफगानिस्तान में अमेरिका का साथ दिया। कई यूरोपीय देशों ने सैनिक भेजे और सैकड़ों सैनिक मारे भी गए। इससे साफ है कि जरूरत पड़ने पर यूरोप ने भी अमेरिका का साथ निभाया है।
ट्रंप का दावा कितना सही
डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि NATO में अमेरिका ज्यादा खर्च करता है और यूरोप कम योगदान देता है। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। यूरोप भी NATO में आर्थिक और सैन्य योगदान देता है और कई अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा चुका है। इसलिए इसे एकतरफा “अमेरिका का बोझ” कहना सही नहीं होगा।
साझेदारी का असली खेल
असल में NATO एक ऐसा गठबंधन है, जिसमें दोनों पक्षों को फायदा मिला है। अमेरिका को ताकत, बाजार और प्रभाव मिला, जबकि यूरोप को सुरक्षा और स्थिरता। अगर NATO नहीं होता, तो शायद अमेरिका इतना प्रभावशाली नहीं बन पाता। इसलिए यह कहना कि सिर्फ अमेरिका ने एहसान किया, या सिर्फ यूरोप को फायदा हुआ, दोनों ही अधूरी सच्चाई हैं।