अमेरिका जल्द ही ईरान के उस तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रहा है, जो इस समय टैंकरों में फंसा हुआ है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के अनुसार, समुद्र में करीब 140 मिलियन बैरल ईरानी तेल मौजूद है। अगर इसे बाजार में उतारा जाता है, तो यह 10 दिन से लेकर 2 हफ्ते तक की ग्लोबल सप्लाई के बराबर हो सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
ट्रंप सरकार की नई रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तेल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठा सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला अस्थायी हो सकता है, जैसा पहले रूस के तेल को लेकर कुछ राहत दी गई थी। अगर ऐसा होता है, तो यह ट्रंप की 2016 से लागू “मैक्सिमम प्रेशर” नीति के विपरीत होगा, जिसमें ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे। यह बदलाव अमेरिका की रणनीति में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
तेल की कीमतें क्यों बढ़ीं
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हमलों के कारण तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। खासतौर पर होर्मूज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री रास्तों में बाधा आने से कीमतों में तेजी आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत पहले करीब 79 डॉलर प्रति बैरल थी, जो बढ़कर 119 डॉलर तक पहुंच गई। इस तेजी ने दुनियाभर में ईंधन की कीमतों को प्रभावित किया है और महंगाई का दबाव भी बढ़ाया है।
क्या होगा इसका असर
अगर ईरानी तेल बाजार में आता है, तो कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को फायदा होगा। लेकिन दूसरी ओर, इससे ईरान को आर्थिक रूप से मजबूती भी मिलेगी, क्योंकि वह बिना प्रतिबंध के तेल बेच सकेगा। अमेरिका में पहले से ही बढ़ती पेट्रोल कीमतों का असर आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। ऐसे में यह कदम आर्थिक दबाव कम करने के लिए उठाया जा सकता है, लेकिन इसके राजनीतिक असर भी दूरगामी हो सकते हैं।