Exclusive: एक नहीं 32 सेनाओं से जूझ रहा अमेरिका! ईरान की ‘मोज़ैक’ रणनीति ने युद्ध को बनाया लंबा और बेहद जटिल

मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अब विशेषज्ञ ईरान की “मोज़ैक रणनीति” की चर्चा कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि जब शुरुआती हमलों में शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तब भी ईरान की सेना कैसे लड़ती रही। बताया जाता है कि ईरान ने वर्षों पहले ही ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर ली थी। इसी तैयारी का हिस्सा है उसकी मोज़ैक रणनीति, जिसमें सेना को छोटे-छोटे स्वतंत्र हिस्सों में बांट दिया गया है ताकि एक हिस्सा खत्म होने पर भी बाकी लड़ाई जारी रख सकें।

इराक युद्ध से मिला बड़ा सबक

2003 में जब अमेरिका ने इराक़ पर हमला कर सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया, तब पूरी दुनिया ने देखा कि एक ही झटके में पूरे देश की व्यवस्था बिखर गई। इसका कारण था कि सारी शक्ति और कमान एक ही केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में थी। यही घटना ईरान के लिए बड़ा सबक बन गई और उसने अपनी सैन्य रणनीति पर गंभीरता से काम शुरू किया।

सेना का ढांचा पूरी तरह बदला

इसके बाद ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर मोहम्मद जाफ़री ने 2005 के आसपास सेना के ढांचे में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने पारंपरिक केंद्रीय कमांड सिस्टम की जगह “मोज़ैक कमांड स्ट्रक्चर” लागू किया। इसका मकसद था कि अगर शीर्ष नेतृत्व पर हमला हो जाए तो भी सेना पूरी तरह खत्म न हो।

32 कमांड में बंटी सेना

इस रणनीति के तहत ईरान के 31 प्रांतों में अलग-अलग सैन्य कमांड बनाए गए और राजधानी तेहरान में एक अतिरिक्त कमांड जोड़ा गया। यानी कुल मिलाकर 32 अलग-अलग कमांड तैयार किए गए। हर कमांड के अपने कमांडर, हथियार, खुफिया नेटवर्क और आदेश देने की स्वतंत्र व्यवस्था है। इस तरह एक ही सेना कई छोटी-छोटी सेनाओं में बदल गई।

हर यूनिट खुद लड़ने में सक्षम

मोज़ैक रणनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर कमांड स्वतंत्र रूप से युद्ध लड़ सकती है। अगर किसी एक यूनिट के कमांडर या सैनिक खत्म भी हो जाएं तो बाकी यूनिटों पर उसका असर नहीं पड़ता। हर यूनिट अपने स्तर पर मिसाइल या ड्रोन हमला करने के फैसले ले सकती है। यही कारण है कि युद्ध के दौरान कई दिशाओं से हमले होते दिखाई देते हैं।

कमांडर के कई उत्तराधिकारी तय

ईरान ने इस सिस्टम में एक और सुरक्षा व्यवस्था भी बनाई है। हर कमांडर के बाद उसके तीन-चार स्तर तक उत्तराधिकारी पहले से तय रहते हैं। अगर पहला कमांडर मारा जाए तो तुरंत दूसरा जिम्मेदारी संभाल लेता है। जरूरत पड़ने पर तीसरा और चौथा अधिकारी भी कमान संभाल सकता है। इससे कमांड चेन टूटने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

क्षेत्रीय सहयोगियों का भी सहारा

ईरान की रणनीति सिर्फ अपनी सेना तक सीमित नहीं है। उसकी विशेष इकाई क़ुद्स फ़ोर्स क्षेत्र में कई सहयोगी समूहों के साथ काम करती है। उदाहरण के लिए हिज़्बुल्लाह लेबनान में और हूथी आंदोलन यमन में सक्रिय हैं। ये समूह अलग-अलग मोर्चों पर दबाव बनाकर विरोधी देशों को कई दिशाओं में उलझाए रखते हैं।

लंबी जंग के लिए बनाई रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि मोज़ैक रणनीति का मुख्य उद्देश्य युद्ध को लंबा खींचना है। ईरान को पता है कि शक्तिशाली सेना से सीधी टक्कर मुश्किल होती है, इसलिए वह छापामार और लंबे संघर्ष की रणनीति अपनाता है। छोटे-छोटे हमले, ड्रोन और मिसाइल हमले और अलग-अलग मोर्चों पर दबाव बनाकर विरोधी को थकाने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि इस रणनीति को लंबे युद्ध के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है।

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Author: The Hindi Post