17 फरवरी से अग्नि पंचक की शुरुआत हो गई है और ज्योतिष के अनुसार यह समय बेहद संवेदनशील माना जाता है. पंचक तब लगता है जब चंद्रमा धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र में रहता है. पंचक की अवधि कुल पांच दिनों की होती है और इन दिनों को विशेष सावधानी का समय माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान किए गए कई कार्य शुभ परिणाम नहीं देते. मंगलवार से शुरू होने पर इसे अग्नि पंचक कहा जाता है, जिसे और भी अधिक प्रभावशाली और संवेदनशील माना जाता है. इस दौरान आग, दुर्घटनाओं और विवादों का खतरा ज्यादा रहने की आशंका बताई जाती है.
सूर्य ग्रहण से बढ़ी संवेदनशीलता
इस बार अग्नि पंचक की शुरुआत सूर्य ग्रहण और फाल्गुन अमावस्या के दिन से हुई है, जिससे इसकी संवेदनशीलता और बढ़ गई है. ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार जब पंचक किसी विशेष खगोलीय घटना के साथ शुरू होता है, तो उसका प्रभाव अधिक गहरा माना जाता है. ऐसे में लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. यह समय मानसिक तनाव, अनिश्चितता और जोखिम वाले कामों से बचने का माना जाता है. इसलिए इन पांच दिनों में सोच-समझकर ही कोई बड़ा निर्णय लेना चाहिए और जल्दबाजी से बचना चाहिए.
पंचक में किन कामों से बचें
अग्नि पंचक के दौरान कुछ काम बिल्कुल नहीं करने की सलाह दी जाती है. सबसे पहले दक्षिण दिशा की यात्रा टालनी चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि इससे दुर्घटना या नुकसान की संभावना बढ़ती है. इसके अलावा घर बनवाना, छत डलवाना या निर्माण से जुड़े काम भी नहीं करने चाहिए. ऐसा माना जाता है कि इन दिनों शुरू किए गए निर्माण कार्यों से घर में कलह या परेशानी बढ़ सकती है. मशीनरी से जुड़े जोखिम भरे काम और बड़े निवेश भी इस समय टालना बेहतर माना जाता है, क्योंकि अनहोनी या नुकसान का खतरा अधिक रहता है.
सावधानी और धैर्य है सबसे जरूरी
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार अग्नि पंचक का समय सतर्कता और संयम बरतने का होता है. इस दौरान जल्दबाजी में निर्णय लेने या जोखिम उठाने से बचना चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जरूरी कार्य करना भी पड़े तो पूरी सावधानी और सोच-समझकर ही करें. यह समय धैर्य रखने, विवादों से दूर रहने और सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने का माना जाता है. पंचक समाप्त होने के बाद सामान्य कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं, लेकिन इन पांच दिनों में सतर्क रहना ही सबसे बेहतर उपाय माना जाता है.