तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सरकार के बीच एक बार फिर तनाव देखने को मिला है। मंगलवार को विधानसभा सत्र की शुरुआत हुई, जहां परंपरा के अनुसार राज्यपाल को अभिभाषण देना था। लेकिन पिछले साल की तरह इस बार भी आरएन रवि बिना भाषण पढ़े ही सदन से बाहर चले गए। राजभवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि राज्यपाल को उम्मीद थी कि उनके जाने के बाद राष्ट्रगान बजाया जाएगा, लेकिन उसकी जगह तमिल मातृ दिवस का शुभकामना गीत बजाया गया। इसी बात पर उन्होंने नाराजगी जताई।
राजभवन के आरोप और सरकार की प्रतिक्रिया
राजभवन ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में कई गलत जानकारियां शामिल थीं। इसके अलावा, राज्यपाल का माइक्रोफोन कई बार बंद किया गया, जिससे उन्हें अपनी बात रखने से रोका गया। बयान में यह भी कहा गया कि विधानसभा में राष्ट्रगान का अपमान किया गया है। वहीं, तमिलनाडु सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य में एक तय परंपरा का पालन किया गया है। सरकार का कहना है कि यह कोई नया नियम नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही व्यवस्था है।
संसद और राज्यों में क्या है नियम?
भारतीय संसद में राष्ट्रपति के भाषण के दौरान राष्ट्रगान के लिए एक तय प्रोटोकॉल होता है। राष्ट्रपति के आने और जाने के समय राष्ट्रगान बजाया जाता है। हालांकि, राज्यों की विधानसभाओं में यह परंपरा अलग-अलग होती है। उदाहरण के तौर पर, नागालैंड में 2021 तक राष्ट्रगान नहीं बजाया जाता था। त्रिपुरा विधानसभा में भी 2018 में पहली बार इसे बजाया गया। यानी देशभर में इसे लेकर कोई एक समान नियम लागू नहीं है और हर विधानसभा अपनी परंपरा के अनुसार काम करती है।
संविधान और कोर्ट का क्या कहना है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(A)(a) के तहत राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है। गृह मंत्रालय ने भी कुछ गाइडलाइंस जारी की हैं, जिनमें बताया गया है कि किन मौकों पर राष्ट्रगान बजाया जाना चाहिए। हालांकि, जनवरी 2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा था कि किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में राष्ट्रगान बजाने को लेकर कोई सख्त कानूनी बाध्यता नहीं है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि राज्य में भाषण की शुरुआत तमिल थाई वज़्थु से होती है और अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है, जो 1991 से चली आ रही परंपरा है।