उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) योजना में वेतन सीमा के संशोधन पर बड़ा निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार को चार महीने के भीतर इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय लेना होगा। न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने माना कि ईपीएफ की मौजूदा वेतन सीमा लंबे समय से जस की तस बनी हुई है, जबकि आर्थिक हालात और वेतन स्तर काफी बदल चुके हैं।
15 हजार से ऊपर वेतन वालों की एंट्री बंद
याचिका में बताया गया कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) फिलहाल केवल उन्हीं कर्मचारियों को योजना में शामिल करता है, जिनकी मासिक आय 15,000 रुपये या उससे कम है। यह सीमा पिछले 11 वर्षों से बदली नहीं गई है। याचिकाकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि देश के कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही इस सीमा से अधिक हो चुका है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में कर्मचारी ईपीएफ जैसी अहम सामाजिक सुरक्षा योजना से बाहर हैं, जो उनके भविष्य को असुरक्षित बनाता है।
70 साल में मनमाना रहा वेतन संशोधन
याचिका में यह भी कहा गया कि बीते 70 वर्षों में ईपीएफ की वेतन सीमा का संशोधन बेहद मनमाने तरीके से किया गया। कई बार 13 से 14 साल तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। इस दौरान न तो महंगाई, न न्यूनतम वेतन और न ही प्रति व्यक्ति आय जैसे अहम आर्थिक संकेतकों को ध्यान में रखा गया। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर इस आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन पेश करे, ताकि सरकार इस पर निर्णय ले सके।
कम कर्मचारियों तक सिमटता ईपीएफ लाभ
याचिका के अनुसार, इस असंतुलित नीति का नतीजा यह हुआ है कि पहले की तुलना में आज बहुत कम कर्मचारियों को ईपीएफ योजना का लाभ मिल पा रहा है। वर्ष 2022 में ईपीएफओ की एक उप-समिति ने वेतन सीमा बढ़ाने की सिफारिश की थी, जिसे केंद्रीय बोर्ड ने भी मंजूरी दी थी। बावजूद इसके, केंद्र सरकार ने अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया। याचिका में कहा गया कि शुरुआती दशकों में ईपीएफ योजना ज्यादा समावेशी थी, लेकिन पिछले 30 वर्षों में यह धीरे-धीरे कर्मचारियों को बाहर रखने का माध्यम बन गई है।