दक्षिण एशिया की राजनीति में पुरुष वर्चस्व आम बात है, लेकिन बांग्लादेश ने तीन दशकों तक इस धारणा को तोड़ा। पाकिस्तान और अफगानिस्तान से अलग, बांग्लादेश की राजनीति करीब 30 साल तक दो ताकतवर महिलाओं के नाम रही- खालिदा जिया और शेख हसीना। सैन्य दखल, कट्टरपंथ और हिंसा के बावजूद इन दोनों ने सत्ता की धुरी अपने हाथों में रखी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। एक नेता निर्वासन में हैं, दूसरी इस दुनिया से जा चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह महिला नेतृत्व के युग का अंत है?
खालिदा जिया: गृहिणी से प्रधानमंत्री
खालिदा जिया का निधन 30 दिसंबर 2025 को ढाका में हुआ। 80 साल की खालिदा लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। राजनीति में उनका प्रवेश अचानक हुआ, जब उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या हुई। एक गृहिणी से देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने तक का उनका सफर ऐतिहासिक रहा। 1991 में उन्होंने सत्ता संभाली और 2001 में दोबारा प्रधानमंत्री बनीं। 1991 से 2008 तक वह हर चुनाव जीतती रहीं, चाहे सीट कोई भी रही हो। उनकी हार कभी वोट से नहीं, बल्कि अदालत के फैसले से हुई।
शेख हसीना: लंबा शासन, अचानक पतन
खालिदा जिया की प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली नेता रहीं। वह पांच बार प्रधानमंत्री बनीं और 20 साल से ज्यादा समय तक देश की राजनीति पर हावी रहीं। लेकिन 2024 में आरक्षण विवाद से शुरू हुए आंदोलन ने तख्तापलट का रूप ले लिया। 5 अगस्त 2024 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद उनकी पार्टी अवामी लीग का रजिस्ट्रेशन भी सस्पेंड कर दिया गया। सत्ता के केंद्र से उनका पूरी तरह हट जाना महिला राजनीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
क्या महिला नेतृत्व का भविष्य है?
खालिदा जिया और शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में महिला चेहरा लगभग गायब है। बीएनपी की कमान अब खालिदा के बेटे तारिक रहमान के हाथ में है। पार्टी में कोई मजबूत महिला नेता नजर नहीं आती। उनकी पोती जाइमा रहमान का नाम जरूर चर्चा में है, लेकिन उन्होंने अभी राजनीति में औपचारिक एंट्री नहीं की है। अन्य दलों जमात-ए-इस्लामी या नेशनल सिटिजन्स पार्टी में भी महिला नेतृत्व की कमी साफ दिखती है। ऐसे में मंच फिलहाल खाली है और महिला राजनीति का भविष्य अनिश्चित नजर आता है।