London से उठी हलचल, झूठी रिपोर्ट पर तीखा पलटवार, असल साज़िश क्या है?

लंदन और नई दिल्ली के सियासी-प्रवासी गलियारों में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब एक ऑनलाइन पोर्टल पर प्रकाशित रिपोर्ट को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे। रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों को पूरी तरह आधारहीन बताते हुए एक वरिष्ठ प्रवासी नेता ने इसे दुर्भावनापूर्ण और साज़िशन करार दिया है। उनका कहना है कि यह लेख न तो किसी ठोस सबूत पर आधारित है और न ही पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों का पालन करता है। दावा किया गया कि यह पूरी कवायद असली आपराधिक जांच से ध्यान भटकाने और एक साफ सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है।

पुरानी माफी, रिकॉर्डेड बातचीत और सवालों के घेरे में लेखक

इस पूरे विवाद में सबसे चौंकाने वाला पहलू वह रिकॉर्डेड बातचीत है, जिसका जिक्र सामने आया है। बताया गया कि रिपोर्ट से जुड़े एक वरिष्ठ संपादक पहले भी झूठी खबरों को लेकर माफी मांग चुके हैं। उस बातचीत में गलती स्वीकार करने और लिखित माफीनामा प्रकाशित करने की पेशकश तक की बात सामने आई थी, जिसका ऑडियो प्रमाण मौजूद होने का दावा किया गया है। यहीं से सवाल उठता है कि अगर पहले गलती मानी जा चुकी है, तो वही आरोप दोबारा किस मंशा से उछाले गए।

कानूनी शिकंजा और दूसरे मामलों की परछाईं

मामला यहीं नहीं रुका। इन आरोपों के खिलाफ संबंधित संपादकों और उनसे जुड़े नामों पर औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज होने की बात कही गई है। शिकायत में गंभीर आरोप शामिल हैं, जिनमें कथित आपराधिक नेटवर्क, संदिग्ध फंडिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों से जुड़े पहलू बताए गए हैं। साथ ही, कुछ अन्य मामलों का हवाला भी दिया गया है, जिनकी जांच ब्रिटेन में पहले से चल रही थी और जिन पर मीडिया रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं। आरोप लगाने वालों पर ही सवाल खड़े होने से इस पूरी कहानी की दिशा बदलती नजर आ रही है।

छवि, देशभक्ति और मीडिया से सीधा संदेश

अपने बयान में संबंधित नेता ने दो टूक कहा कि उनके लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हमेशा ईमानदारी और नागरिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी है। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के समर्थन और प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ रचनात्मक भूमिका को उन्होंने अपनी पहचान बताया। किसी भी तरह की भारत-विरोधी या उग्रवादी गतिविधि से खुद को जोड़ने को उन्होंने पूरी तरह झूठा और मानहानिकारक बताया। साथ ही मीडिया से अपील की गई कि बिना दस्तावेजी सबूत, पक्ष लिए बिना और कानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर कोई भी निष्कर्ष न निकाला जाए। फिलहाल, वकीलों के जरिए कानूनी कार्रवाई जारी है और अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सच की परतें आगे कैसे खुलती हैं।

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra