ICT का बड़ा फैसला: हसीना दोषी करार, संपत्ति जब्त करने का आदेश, बांग्लादेश ने भारत से तुरंत प्रत्यर्पण मांगा

बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हत्या के लिए उकसाने और हत्या का आदेश देने के आरोप में मौत की सजा सुनाई है। उन पर कुल पांच मामलों में आरोप तय किए गए थे। फैसला आने के साथ ही उनकी संपत्तियों को जब्त करने का आदेश भी दिया गया है। इस निर्णय के बाद अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने तुरंत भारत से हसीना को सौंपने की मांग कर दी है। इसके लिए भारत को आधिकारिक पत्र भेजा गया है और इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की तैयारी भी चल रही है।

दिल्ली दौरे में उठ सकता है बड़ा मुद्दा

मीडिया रिपोर्टों का दावा है कि अगले सप्ताह बांग्लादेश के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर दिल्ली आएंगे। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर विशेष चर्चा होगी, क्योंकि हसीना इस समय भारत में मौजूद हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत उन्हें बांग्लादेश को सौंपेगा या नहीं।

पहले भी कई बार उठी प्रत्यर्पण की मांग

बांग्लादेश ने पहली बार दिसंबर 2024 में भारत से हसीना को सौंपने का अनुरोध किया था, जब छात्र प्रदर्शनों के बीच वह नई दिल्ली आई थीं और उनका 15 साल का शासन अचानक समाप्त हो गया था। अगस्त में कार्यभार संभालने के बाद मोहम्मद यूनुस ने दोबारा यह मांग दोहराई, उनका कहना था कि हसीना को उनकी सरकार के दौरान हुए अपराधों के लिए अदालत में पेश किया जाना चाहिए।

क्या कहती है 2013 की प्रत्यर्पण संधि?

भारत-बांग्लादेश की प्रत्यर्पण संधि स्पष्ट रूप से कहती है कि अगर कोई मामला राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित लगता है, तो दूसरा देश उसे अस्वीकार कर सकता है। हसीना अपने खिलाफ चल रहे ट्रायल को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताती रही हैं। उनका कहना है कि फैसला पक्षपातपूर्ण है, उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और यह निर्णय ऐसी अंतरिम सरकार के अधीन आया है जिसका कोई जनादेश ही नहीं है। संधि में हत्या जैसी गंभीर घटनाओं को राजनीतिक अपराध की श्रेणी से बाहर रखा गया है, लेकिन अगर किसी आरोप में निष्पक्षता की कमी या बदनीयती दिखाई देती है, तो प्रत्यर्पण रोका जा सकता है।

भारत का कदम तय करेगा भविष्य

अब पूरी स्थिति भारत की प्रतिक्रिया पर टिकी है। भारत चाहे तो प्रत्यर्पण अनुरोध स्वीकार कर सकता है, लेकिन उसके पास इसे ठुकराने के कानूनी आधार भी उतने ही मजबूत हैं। भारत यह भी देखेगा कि हसीना को सौंपने पर क्या उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन होने की आशंका है, या क्या ट्रिब्यूनल का फैसला निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया से मेल खाता है। आने वाले दिनों में इस मामले पर भारत का रुख पूरे क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra