Screen के गुलाम बन रहे बच्चे! 89% बच्चे फोन के जाल में फंसे, एक्सपर्ट बोले- मानसिक विकास पर पड़ रहा असर

आज के दौर में मोबाइल फोन हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। बड़े ही नहीं, बच्चे भी अब दिन का लंबा समय स्क्रीन के सामने बिताने लगे हैं। कई बार माता-पिता बच्चों को चुप कराने या उनका ध्यान भटकाने के लिए खुद ही उन्हें फोन थमा देते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल न सिर्फ बच्चों की शारीरिक सेहत बल्कि मानसिक विकास के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है। इसी विषय पर इंडियन एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स, कोल्लम के जिला अध्यक्ष डॉक्टर मनोज मनी ने एक स्टडी की, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

स्टडी में सामने आया चिंताजनक आंकड़ा

डॉ. मनोज मनी की स्टडी के अनुसार, करीब 89.1 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी रूप में मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताते हैं। यह अध्ययन यह समझने के लिए किया गया कि बच्चे मोबाइल कितना इस्तेमाल करते हैं, इसका माता-पिता की शिक्षा, पारिवारिक स्थिति और सामाजिक पृष्ठभूमि से क्या संबंध है। इस शोध में यह भी पाया गया कि बच्चे किन समयों पर मोबाइल सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं और माता-पिता किन परिस्थितियों में उन्हें फोन चलाने की अनुमति देते हैं।

18 महीने के बच्चों पर हुई रिसर्च

यह अध्ययन 18 महीने की उम्र के उन बच्चों पर केंद्रित था, जो टीकाकरण केंद्रों पर आए थे। शोधकर्ताओं ने बच्चों के परिवारों के शैक्षणिक और सामाजिक स्तर का भी विश्लेषण किया। इससे पता चला कि माता-पिता की शिक्षा और आर्थिक स्थिति, दोनों ही बच्चों के स्क्रीन टाइम को प्रभावित करती हैं। जिन माओं ने केवल 10वीं तक पढ़ाई की थी, उनके बच्चों में मोबाइल एक्सपोजर 100 प्रतिशत था, जबकि 12वीं तक पढ़ी माओं के बच्चों में यह 89 प्रतिशत रहा। वहीं, डिप्लोमा या ग्रेजुएट माओं के बच्चों में यह 91 प्रतिशत और पोस्ट-ग्रेजुएट माओं के बच्चों में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत तक पाया गया।

कब और क्यों देते हैं माता-पिता फोन?

स्टडी के अनुसार, 69 प्रतिशत माता-पिता अपने बच्चों को खाना खिलाते वक्त मोबाइल देते हैं, ताकि बच्चे आसानी से खाना खा लें। वहीं, 50 प्रतिशत बच्चे अपने भाई-बहनों को देखकर फोन इस्तेमाल करने लगते हैं। दिलचस्प बात यह रही कि गरीब परिवारों में बच्चों का स्क्रीन टाइम कम पाया गया क्योंकि उनके पास स्मार्टफोन तक पहुंच सीमित थी।

फैमिली स्ट्रक्चर का भी दिखा असर

अध्ययन में यह भी सामने आया कि बच्चे किस प्रकार के परिवार में रहते हैं, इसका उनके मोबाइल इस्तेमाल पर सीधा असर पड़ता है। जो बच्चे न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) में रहते हैं, उनमें मोबाइल एक्सपोजर 78 प्रतिशत पाया गया, जबकि जॉइंट फैमिली (संयुक्त परिवार) में रहने वाले बच्चों में यह आंकड़ा 91 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह रिसर्च डॉक्टर जीना की निगरानी में डॉक्टर रंजीता द्वारा की गई थी और इसकी रिपोर्ट कोल्लम के जिला चिकित्सा अधिकारी एम.एस. अनु को सौंपी गई।

इस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि मोबाइल फोन अब बच्चों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि पेरेंट्स समय रहते बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें, ताकि उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर इसका नकारात्मक असर न पड़े।

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Author: The Hindi Post