हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और अपनी संतान के सुखी जीवन की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर संतान के जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार को रखा जाएगा।
सुबह से शाम तक रखा जाता है निर्जला व्रत
अहोई अष्टमी के दिन कई महिलाएं सूर्योदय से लेकर शाम को तारों के दर्शन होने तक निर्जला व्रत रखती हैं। शाम के समय अहोई माता की पूजा की जाती है और व्रत कथा सुनी जाती है। इसके बाद आसमान में तारों के दर्शन करके उन्हें जल अर्पित किया जाता है। तारों को अर्घ्य देने के बाद महिलाएं व्रत का पारण करती हैं। हालांकि, व्रत और पूजा की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।
अहोई माता का चित्र और पूजा चौकी रखें
पूजा की तैयारी के लिए सबसे पहले अहोई माता का चित्र या कैलेंडर रखें। कई घरों में दीवार पर गेरू से अहोई माता और स्याहू के बच्चों की आकृति भी बनाई जाती है। इसके बाद एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर माता का चित्र स्थापित करें। पूजा में रोली, कुमकुम, हल्दी और साबुत चावल यानी अक्षत जरूर रखें। इन चीजों से माता को तिलक लगाया जाता है और पूजा की जाती है।
पूजा की थाली में जरूर रखें ये सामान
अहोई अष्टमी की पूजा के लिए धूप, अगरबत्ती और कपूर रखना न भूलें। आरती के समय इनका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा एक लोटे, कलश या करवे में साफ पानी भरकर रखें। इसी जल से परंपरा के अनुसार तारों को अर्घ्य दिया जाता है। पूजा में कलावा या मौली भी रखें। कई परिवारों में चांदी की अहोई या स्याहू की माला रखने और पहनने की परंपरा होती है। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसकी व्यवस्था पहले से कर लें।
फल, प्रसाद और सुहाग की सामग्री भी जरूरी
पूजा में अहोई माता को भोग लगाने के लिए मौसमी फल रख सकती हैं। इसमें केला, सेब, अनार और सिंघाड़ा शामिल कर सकती हैं। कुछ जगहों पर मूली भी पूजा और प्रसाद का हिस्सा होती है। इसके अलावा पूजा की थाली में बिंदी, चूड़ी, काजल और लाल चुनरी जैसी सुहाग सामग्री रखी जाती है। कई महिलाएं अहोई माता को श्रृंगार का सामान अर्पित करती हैं। इसके साथ प्रसाद और भोग की व्यवस्था भी पहले से कर लें।
व्रत कथा की किताब रखना न भूलें
अहोई अष्टमी की पूजा में व्रत कथा का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले अहोई अष्टमी व्रत कथा की पुस्तक या पूजा कैलेंडर जरूर रख लें। शाम को माता की पूजा करने के बाद परिवार के साथ व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद विधि-विधान से आरती करें और तारों को अर्घ्य दें। पूजा की सभी सामग्री पहले से इकट्ठा कर लेने से आखिरी समय में भागदौड़ नहीं होगी और आप पूरे श्रद्धाभाव से पूजा कर सकेंगी।