दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर से सिनेमा जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों में शोक की लहर है। उनकी इच्छा के अनुसार पुणे के खड़कवासला स्थित डोंजे गांव में उनके फार्म हाउस की जमीन पर अंतिम संस्कार किया गया। महाराष्ट्र सरकार की ओर से उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। दूर-दूर से लोग अपने पसंदीदा अभिनेता के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
संघर्ष से शुरू हुआ नाना बनने का सफर
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना का पूरा नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। कम उम्र में उन्होंने पोस्टर चिपकाने और सड़कों पर जेबरा क्रॉसिंग पेंट करने तक का काम किया। बाद में जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान थिएटर से जुड़े। यहीं से अभिनय का सफर शुरू हुआ और ‘विश्वनाथ’ की जगह ‘नाना’ नाम उनकी पहचान बन गया।
‘गमन’ से शुरू हुआ पांच दशक का सफर
नाना ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इसके बाद ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में यादगार किरदार निभाए। गंभीर, खतरनाक से लेकर कॉमेडी तक, उन्होंने हर तरह की भूमिका को अपनी अलग शैली दी। करीब पांच दशक के करियर में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर और पद्म श्री जैसे बड़े सम्मान मिले।

हेमलकसा ने बदली जिंदगी की सोच
नाना पाटेकर का समाजसेवा से जुड़ाव भी बेहद गहरा था। वह समाजसेवी बाबा आमटे को पिता समान मानते थे और हेमलकसा जाकर आदिवासियों के बीच समय बिताते थे। वहां उन्होंने जरूरतमंदों और कुष्ठ रोगियों की सेवा में भी हाथ बंटाया। डॉ. प्रकाश आमटे के काम से प्रभावित होकर नाना ने उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभाई। इस अनुभव ने उनकी सोच और सामाजिक सरोकारों को और मजबूत किया।
किसानों के लिए खड़े हुए नाना
किसानों की समस्याओं को लेकर नाना पाटेकर लगातार आवाज उठाते रहे। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की। संस्था ने सूखा प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण, किसान परिवारों की मदद और बच्चों की शिक्षा जैसे काम किए। नाना अपने फार्म हाउस पर स्थानीय किसानों के साथ खेती भी करते थे। खेती से होने वाली कमाई को किसानों के साथ बांटने की बात भी सामने आती रही।
सेना से था खास रिश्ता
नाना का भारतीय सेना से जुड़ाव भी उनकी जिंदगी का खास हिस्सा रहा। फिल्म ‘प्रहार’ के लिए उन्होंने सैन्य और कमांडो ट्रेनिंग ली थी। बाद में उन्हें मानद कैप्टन की रैंक भी मिली। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वह जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए अग्रिम इलाकों तक पहुंचे थे। देश और सैनिकों के प्रति उनका जुड़ाव फिल्मों से आगे वास्तविक जीवन में भी दिखाई देता था।

नाना सिर्फ अभिनेता नहीं थे
नाना ने अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन में भी अपनी पहचान बनाई। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के जरिए उन्होंने निर्देशन किया। निजी जिंदगी में उन्होंने कई बड़े दुख झेले और अपने परिवार को हमेशा मीडिया की नजरों से दूर रखा। वह सादगी पसंद जीवन जीने के लिए जाने जाते थे। फिल्मी चमक-दमक के बावजूद खेती, समाजसेवा और जरूरतमंदों की मदद उनके जीवन का अहम हिस्सा बनी रही।
किरदारों के साथ हमेशा जिंदा रहेंगे
‘क्रांतिवीर’ के प्रताप तिलक से लेकर ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी और ‘नटसम्राट’ के अप्पा बेलवलकर तक, नाना ने ऐसे किरदार दिए जिन्हें भुलाना मुश्किल है। उनकी बेबाक आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और अभिनय की गहराई हमेशा याद की जाएगी। नाना की विदाई के साथ एक बड़ा फिल्मी अध्याय जरूर खत्म हुआ, लेकिन उनके किरदार, फिल्में और समाजसेवा की विरासत आने वाली पीढ़ियों तक उनके नाम को जिंदा रखेगी।