पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। हालांकि, कई बार समय, परिस्थिति या अन्य कारणों से विधि-विधान के अनुसार श्राद्ध करना संभव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपनी क्षमता और सुविधा के मुताबिक पितरों का स्मरण किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और भावना को माना जाता है।
पशु-पक्षियों को भोजन जरूर कराएं
पितृपक्ष में पशु-पक्षियों को भोजन और दाना-पानी देना आसान उपाय माना जाता है। आप रोजाना गाय को पहली रोटी खिला सकते हैं। इसके अलावा कौवे के लिए भोजन निकालना, चींटियों को आटा या दाना डालना और चिड़ियों के लिए पानी रखना भी किया जा सकता है। मान्यता है कि इन कार्यों के जरिए व्यक्ति अपने पितरों को याद करने और सेवा का भाव व्यक्त करता है। इसके लिए किसी विशेष खर्च या कठिन विधि की जरूरत नहीं होती।
सर्वपितृ अमावस्या पर करें तर्पण
अगर किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, तो पितृपक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों का तर्पण या पिंडदान किया जा सकता है। इस दिन सभी पितरों के लिए श्राद्ध करने की परंपरा मानी जाती है। इसलिए जिन लोगों से पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध नहीं हो पाया, वे इस दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार पितरों का स्मरण कर सकते हैं और तर्पण कर सकते हैं।
जरूरतमंद को भोजन और दान करें
पितृपक्ष के दौरान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना भी किया जा सकता है। इसके साथ अन्न, वस्त्र या जरूरत की दूसरी चीजों का दान भी अपनी क्षमता के मुताबिक करें। धार्मिक मान्यताओं में सेवा और दान को महत्वपूर्ण माना गया है। इसके लिए किसी बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है। अपनी सुविधा के अनुसार किया गया छोटा-सा सेवा कार्य भी श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम बन सकता है।
काले तिल के साथ जल करें अर्पित
अगर आपको श्राद्ध की पूरी विधि नहीं आती है, तो सरल तरीके से पितरों का तर्पण किया जा सकता है। सुबह स्नान करने के बाद तांबे के पात्र में जल लें और उसमें काले तिल डालें। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें। इस दौरान मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव रखें। इसे सरल तर्पण के रूप में किया जाता है।
क्षमा मांगकर पितरों का करें स्मरण
यदि किसी मजबूरी के कारण आप श्राद्ध नहीं कर पा रहे हैं, तो खुले आकाश के नीचे हाथ जोड़कर अपने पितरों का स्मरण करें और अपनी असमर्थता के लिए क्षमा प्रार्थना करें। इन दिनों अपनी श्रद्धा के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता या भागवत का पाठ और स्मरण भी किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृकर्म में विधि के साथ श्रद्धा और भावना को भी विशेष महत्व दिया जाता है।