Cancer Awareness: बच्चों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा, ल्यूकेमिया के ये शुरुआती संकेत दिखें तो तुरंत डॉक्टर से कराएं जांच

भारत में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और बच्चों में भी यह गंभीर चिंता का विषय है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर 9 में से करीब 1 व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी कैंसर होने का जोखिम बताया जाता है। बच्चों में 0 से 14 साल की उम्र के दौरान लिंफाइड ल्यूकेमिया सबसे आम कैंसर में शामिल है। हालिया रिपोर्टों में भारत में हर साल हजारों बच्चों में ल्यूकेमिया का निदान होने का अनुमान लगाया गया है।

बच्चों में कैंसर की वजह क्या होती है

डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चों में कैंसर की सबसे बड़ी वजह कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले बदलाव यानी म्यूटेशन हो सकते हैं। वयस्कों में कैंसर का संबंध कई बार तंबाकू, शराब, मोटापा या लंबे समय तक हानिकारक चीजों के संपर्क से जुड़ा होता है। लेकिन बच्चों में कैंसर आमतौर पर इन कारणों से नहीं होता। कई मामलों में इसका कोई एक स्पष्ट कारण भी सामने नहीं आता।

तेजी से बनती कोशिकाओं में हो सकती है गलती

बच्चों का शरीर तेजी से बढ़ता है, इसलिए उनके शरीर में नई कोशिकाएं भी तेजी से बनती हैं। कोशिकाओं के बनने के दौरान डीएनए की कॉपी में कभी-कभी बदलाव हो सकते हैं। शरीर का प्राकृतिक डीएनए रिपेयर सिस्टम और इम्यून सिस्टम आमतौर पर ऐसी गलतियों को ठीक कर देता है। हालांकि, कुछ बदलाव बने रह जाएं तो आगे चलकर कैंसर का खतरा पैदा हो सकता है।

माता-पिता खुद को दोषी न मानें

बच्चों में कैंसर होने के पीछे ज्यादातर मामलों में माता-पिता की कोई गलती नहीं होती। कुछ बच्चों में जन्मजात जेनेटिक सिंड्रोम कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बीमारी माता-पिता के खान-पान या जीवनशैली की वजह से हुई है। ऐसे समय में परिवार को खुद को दोष देने के बजाय बच्चे की सही जांच और इलाज पर ध्यान देना चाहिए।

ल्यूकेमिया के इन लक्षणों पर रखें नजर

ल्यूकेमिया के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल या संक्रमण जैसी बीमारी के लग सकते हैं। बच्चे को बार-बार या लंबे समय तक बुखार, हाथ-पैरों में दर्द, जोड़ों या शरीर के किसी हिस्से में सूजन, गर्दन में गांठ या ग्लैंड्स बढ़ना और पेट में तिल्ली बढ़ने जैसी समस्या हो सकती है। इन लक्षणों को लगातार नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर शारीरिक जांच और ब्लड टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।

समय पर जांच से इलाज में मिलती है मदद

ल्यूकेमिया के मामलों में समय पर बीमारी की पहचान बेहद महत्वपूर्ण होती है। कई प्रकार के बचपन के ल्यूकेमिया का इलाज संभव है और जल्दी पता चलने पर उपचार जल्द शुरू किया जा सकता है। इससे बच्चे की स्थिति पर लगातार नजर रखने और इलाज को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिलती है। अगर बच्चे में ऐसे लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

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Author: The Hindi Post