पंचांग के अनुसार कजरी तीज भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। 2026 में तृतीया तिथि 30 अगस्त सुबह 9:36 बजे शुरू होगी और 31 अगस्त सुबह 8:50 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त, सोमवार को रखा जाएगा। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से यह व्रत करती हैं।
बूढ़ी तीज नाम के पीछे क्या वजह है?
कजरी तीज को बूढ़ी तीज, बड़ी तीज और सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। बूढ़ी तीज नाम का संबंध उम्र से नहीं, बल्कि तीज के क्रम से माना जाता है। सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज आती है। इसके करीब 15 दिन बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी तीज आती है। इसलिए इसे क्रम में बड़ी और बाद वाली तीज माना जाता है।
हरियाली तीज से कैसे अलग है कजरी तीज?
हरियाली तीज और कजरी तीज दोनों भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित मानी जाती हैं, लेकिन दोनों की परंपराएं अलग हैं। हरियाली तीज सावन में आती है और इसका माहौल उत्सव से भरा रहता है। महिलाएं झूले झूलती हैं और लोकगीत गाती हैं। वहीं कजरी तीज में व्रत, पूजा और कथा का महत्व अधिक माना जाता है।
पति और परिवार की खुशहाली की कामना
कजरी तीज को सुहागिन महिलाओं के लिए खास पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख और शांति बनी रहती है। महिलाएं पति की लंबी उम्र, संतान की सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। कई जगह महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और तीज की कथा सुनती हैं।
सातुड़ी तीज क्यों कहा जाता है?
कजरी तीज का एक लोकप्रिय नाम सातुड़ी तीज भी है। इसके पीछे खान-पान से जुड़ी लोक परंपरा बताई जाती है। कई क्षेत्रों में इस दिन सत्तू से बने पकवान तैयार किए जाते हैं और उन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। इसी वजह से कजरी तीज को सातुड़ी तीज भी कहा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को मनाने के तरीके भी अलग दिखाई देते हैं।
कजरी तीज में क्यों खास है शिव-पार्वती पूजा?
कजरी तीज पर महिलाएं व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। इसके साथ तीज की कथा सुनने और लोकगीत गाने की भी परंपरा है। इस पर्व का संदेश दांपत्य सुख, परिवार की खुशहाली और समृद्धि से जुड़ा है। यानी कजरी तीज सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि लोक आस्था और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।