Health Safety: मिलावट का मकड़जाल, टूथपेस्ट से दूध और मसालों तक, आखिर कितना सुरक्षित है आपका सामान?

आज बाजार में हर चीज को ऑर्गेनिक, नेचुरल, प्रीमियम और सीधे खेत या चक्की से आया बताकर बेचने का चलन बढ़ गया है। ग्राहक से भरोसा करने को कहा जाता है, लेकिन सवाल यह है कि दावा कितना सही है? सुबह के टूथपेस्ट से लेकर रात के रूम फ्रेशनर तक, हर सामान में असली चीज, सुरक्षित चीज और सही जानकारी जानना जरूरी हो गया है। मिलावट सिर्फ प्रोडक्ट में नहीं, कई बार हमारे भरोसे में भी होती है।

पैकेट पर लिखी जानकारी को नजरअंदाज न करें

टूथपेस्ट हो या साबुन, अब सिर्फ खुशबू, स्वाद और झाग देखकर खरीदना काफी नहीं है। टूथपेस्ट में कैल्शियम कार्बोनेट, फ्लोराइड जैसे कई इनग्रीडिएंट्स हो सकते हैं। साबुन और शैम्पू में सिंथेटिक डिटर्जेंट, फ्रेगरेंस, सल्फेट्स और प्रिजर्वेटिव्स इस्तेमाल हो सकते हैं। समस्या इनग्रीडिएंट्स के नाम से ज्यादा उनकी सही जानकारी, मात्रा और तय मानकों के पालन की है।

किचन में मिलावट का सबसे बड़ा खतरा

आटा, दूध, पनीर, खोया और पैक्ड ड्रिंक हमारी रोजमर्रा की जरूरत हैं, इसलिए यहां ज्यादा सावधानी जरूरी है। आटे में सस्ता पदार्थ मिलाकर वजन बढ़ाना या गलत लेबलिंग करना सवाल खड़े करता है। दूध में पानी, स्टार्च और दूसरे पदार्थों की मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। पैक्ड ड्रिंक खरीदते समय फ्रूट कंटेंट, एडेड शुगर और एडिटिव्स की जानकारी जरूर देखें।

मसाले, तेल और शहद भी सवालों के घेरे में

हल्दी, लाल मिर्च और दूसरे पिसे मसालों में रंग या सस्ते पदार्थ मिलाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। काली मिर्च में पपीते के सूखे बीज जैसी मिलावट भी जांच में पकड़ी जाती है। महंगे तेल में सस्ता तेल मिलाना भी गंभीर मामला है। शहद में शुगर सिरप और चायपत्ती में कृत्रिम रंग की शिकायतें बताती हैं कि भरोसे के साथ-साथ जांच भी जरूरी है।

ऑनलाइन खाना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं

लोगों को लगता है कि ऐप से खाना मंगाने पर जोखिम खत्म हो गया, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। खराब हाइजीन, गलत स्टोरेज, बासी खाना, गलत लेबलिंग और फूड सेफ्टी नियमों के उल्लंघन के मामले सामने आते रहे हैं। इसी तरह रूम फ्रेशनर और डिफ्यूजर में सिंथेटिक कंपाउंड्स और VOCs हो सकते हैं। इसलिए लेबल पढ़ना और कमरे में पर्याप्त वेंटिलेशन रखना जरूरी है।

मिलावट रोकने के लिए ग्राहक को भी जागना होगा

महाराष्ट्र में तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारियों की कार्रवाई बताती है कि मिलावट के खिलाफ सख्त निगरानी जरूरी है। लेकिन सिर्फ छापेमारी और जुर्माने से समस्या खत्म नहीं होगी। कंपनियों को सही जानकारी देनी होगी और ग्राहकों को भी सवाल पूछने होंगे। आखिर मिलावट तभी कम होगी, जब मुनाफे से ऊपर ईमानदारी और चुप्पी से ऊपर जागरूकता होगी।

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Author: The Hindi Post