WHO की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता, हाई बीपी समेत तीन दवाओं को बताया कैंसर का जोखिम बढ़ाने वाला, डॉक्टरों ने दी जरूरी सलाह

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिसर्च एजेंसी इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने हाई ब्लड प्रेशर, फंगल इंफेक्शन और ऑर्गन ट्रांसप्लांट में इस्तेमाल होने वाली तीन दवाओं को कार्सिनोजेनिक ग्रुप-1 में रखा है। इनमें हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड, वोरिकोनाजोल और टैक्रोलिमस शामिल हैं। इसका मतलब है कि इन दवाओं से जुड़े कैंसर के जोखिम के वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं, हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि इन्हें लेने वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा।

कार्सिनोजेनिक ग्रुप-1 क्या है?

IARC के अनुसार, ग्रुप-1 में उन्हीं पदार्थों या दवाओं को रखा जाता है जिनके बारे में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों कि वे कुछ परिस्थितियों में कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। यह फैसला केवल एक अध्ययन पर नहीं, बल्कि इंसानों और जानवरों पर हुई कई रिसर्च और वैज्ञानिक समीक्षा के आधार पर लिया गया है। यह वर्गीकरण जोखिम (Hazard) बताता है, न कि हर व्यक्ति के लिए निश्चित खतरा।

किन लोगों को ज्यादा सावधानी?

विशेषज्ञों के मुताबिक, हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड लेने वाले सभी मरीजों में समान जोखिम नहीं होता। लंबे समय तक अधिक मात्रा में दवा लेने वाले और धूप में ज्यादा समय बिताने वाले लोगों में त्वचा संबंधी कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। किसान, निर्माण कार्य करने वाले और अन्य आउटडोर वर्कर्स को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

किस तरह का कैंसर जुड़ा है?

डॉक्टरों का कहना है कि इस दवा का संबंध मुख्य रूप से स्किन कैंसर के कुछ प्रकारों, जैसे बेसल सेल कार्सिनोमा, से देखा गया है। होंठ, जो सीधे धूप के संपर्क में रहते हैं, वहां भी कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। यदि त्वचा पर नया तिल, मस्सा या कोई असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो तुरंत त्वचा विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।

भारत में क्यों अहम है मामला?

भारत में हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड का काफी इस्तेमाल होता है। देश में करोड़ों लोग हाई बीपी से प्रभावित हैं, इसलिए यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वहीं, फंगल इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल होने वाली वोरिकोनाजोल दवा का उपयोग भी केवल डॉक्टर की सलाह पर और सही जरूरत होने पर ही किया जाना चाहिए।

दवा बंद करने से पहले डॉक्टर से मिलें

डॉक्टरों की सबसे अहम सलाह है कि मरीज घबराकर अपनी दवा खुद से बंद न करें। कई मामलों में इन दवाओं के फायदे उनके संभावित जोखिम से कहीं अधिक होते हैं। सही इलाज, नियमित जांच, धूप से बचाव और डॉक्टर की निगरानी में दवा लेना सबसे सुरक्षित तरीका है। किसी भी बदलाव की जरूरत हो तो उसका फैसला केवल डॉक्टर की सलाह से ही करें।

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Author: The Hindi Post