उज्जैन का श्री महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। बाबा महाकाल को कालों का काल कहा जाता है। हर दिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर की सबसे प्रसिद्ध परंपरा भस्म आरती है, जिसे देखने के लिए भक्त देर रात से ही कतारों में लग जाते हैं। इस आरती को लेकर लोगों के मन में कई सवाल भी उठते हैं।
क्या शवों की राख होती है?
लंबे समय से यह मान्यता रही है कि महाकाल की भस्म आरती में भगवान का श्रृंगार श्मशान की राख से किया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में ऐसा नहीं होता। महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरी महाराज के अनुसार, अब बाबा महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म पूरी तरह वैदिक नियमों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार तैयार की जाती है। इसमें किसी शव की राख का उपयोग नहीं किया जाता।
ऐसे तैयार होती है पवित्र भस्म
महंत विनीत गिरी महाराज बताते हैं कि भस्म बनाने के लिए सबसे पहले कपिला गाय के कंडे एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद इन्हें पीपल, बरगद, शमी, पलाश, बेर जैसे पवित्र और औषधीय पेड़ों की लकड़ियों के साथ मंदिर की अखंड धूनी में जलाया जाता है। अग्नि शांत होने के बाद राख को कई बार छानकर शुद्ध और महीन बनाया जाता है। पूरी प्रक्रिया धार्मिक नियमों का पालन करते हुए की जाती है।
मंत्रों के साथ होती है आरती
हर सुबह सबसे पहले बाबा महाकाल का अभिषेक, पूजन और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद शिवलिंग को वस्त्र से ढककर शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रों के बीच महानिर्वाणी अखाड़े के संत भगवान को पवित्र भस्म अर्पित करते हैं। इसी विशेष पूजा को विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती कहा जाता है। मान्यता है कि इसके दर्शन और प्रसाद स्वरूप मिलने वाली भस्म से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद मिलता है।
भस्म आरती की पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, उज्जैन में दूषण नाम के राक्षस ने लोगों को परेशान कर रखा था। भगवान शिव ने उसका वध कर उसे भस्म कर दिया और उसी भस्म को अपने शरीर पर लगाया। तभी से भगवान शिव को भस्म अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई। एक अन्य कथा के अनुसार, माता सती की भस्म भगवान शिव के शरीर पर गिरने से उनका क्रोध शांत हुआ, इसलिए भी भस्म को शिव की प्रिय माना जाता है।
आस्था का जीवंत प्रतीक
महाकाल मंदिर की भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और आस्था का प्रतीक है। समय के साथ इसकी प्रक्रिया में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसकी धार्मिक महत्ता आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है। हर सुबह होने वाली यह आरती देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है और बाबा महाकाल के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को दर्शाती है।