सनातन धर्म में हरियाली तीज और हरतालिका तीज का विशेष महत्व माना जाता है। दोनों व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित हैं। सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से ये व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने की इच्छा से इनका पालन करती हैं।
दोनों व्रतों की तिथि में अंतर
हरियाली तीज का व्रत सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। वहीं हरतालिका तीज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष हरियाली तीज 15 अगस्त और हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई जाएगी। दोनों का उद्देश्य एक जैसा है, लेकिन तिथि और परंपराओं में अंतर देखने को मिलता है।
हरियाली तीज की खास परंपराएं
हरियाली तीज खासतौर पर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा में उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, झूला झूलती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। इसलिए इसे श्रृंगार तीज भी कहा जाता है।
हरतालिका तीज का कठिन निर्जला व्रत
हरतालिका तीज को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया और निर्जला उपवास रखा था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया। इसी कारण सुहागिन महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखकर पूजा करती हैं।
पूजा में रखें इन बातों का ध्यान
हरियाली और हरतालिका तीज की पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती को बेलपत्र, फूल, अक्षत, धूप, दीप, फल, नैवेद्य और सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के दौरान व्रत कथा और आरती करना भी जरूरी माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से की गई पूजा शुभ फल प्रदान करती है।
व्रत के दौरान भूलकर भी न करें गलतियां
तीज के व्रत में मन, वाणी और व्यवहार को शांत और संयमित रखना चाहिए। यदि व्रत का संकल्प लिया है तो उसे बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। तामसिक भोजन और नकारात्मक व्यवहार से बचना चाहिए। श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है।