चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने मामले पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने मांग की कि इस मामले को बड़ी यानी 5 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए। इस पर याचिकाकर्ताओं ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।
सरकार ने बड़ी बेंच क्यों मांगी?
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह पूरी तरह संवैधानिक मामला है। उन्होंने अनुच्छेद 324(2) और 145(3) का हवाला देते हुए कहा कि संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का अधिकार है। इसलिए इस मामले की सुनवाई संविधान पीठ को ही करनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने क्या आपत्ति जताई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया ने कहा कि सरकार ने 28 सुनवाई के बाद अचानक केस ट्रांसफर की मांग की है। उनके मुताबिक इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं। वहीं एडीआर और डॉ. जया गुप्ता की याचिका में कहा गया है कि नए कानून में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखा गया है।
कोर्ट में क्या हुई तीखी बहस?
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि प्रधानमंत्री की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि देश में कितने दागी मंत्री हैं। अदालत में 2023 के अनूप बरनवाल फैसले का भी जिक्र हुआ, जिसमें संसद को इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार माना गया था।
2029 चुनाव से क्यों जुड़ रहा मामला?
इस केस को 2029 के लोकसभा चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। मौजूदा व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और नेता प्रतिपक्ष चुनाव आयुक्तों का चयन करते हैं। 2028 और 2029 में दो वरिष्ठ चुनाव आयुक्त सेवानिवृत्त होने वाले हैं। अगर मामला बड़ी बेंच में जाता है तो फैसला आने में समय लग सकता है और तब तक नियुक्तियां मौजूदा प्रक्रिया से ही हो सकती हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम
सुनवाई के अंत में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि पारदर्शी नियुक्ति सिर्फ होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि लोगों को दिखाई भी देनी चाहिए। अदालत ने सभी पक्षों से लिखित जवाब मांगा है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि मामला बड़ी बेंच को भेजा जाए या मौजूदा बेंच ही इस पर फैसला सुनाए।