हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा। इसी दिन से चार महीने के चातुर्मास की शुरुआत होती है। मान्यता है कि भगवान विष्णु इस दिन योगनिद्रा में चले जाते हैं और पाताल लोक में विश्राम करते हैं। इसलिए इस अवधि को देवताओं का शयनकाल माना जाता है।
क्यों रुक जाते हैं शुभ कार्य?
देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाले चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस समय किए गए शुभ कार्यों का पूरा फल नहीं मिलता। हालांकि, इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, जप और भक्ति का विशेष महत्व बना रहता है और इसे बेहद पुण्यदायक माना गया है।
क्या है व्रत का महत्व?
पद्म पुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है। घर में सुख-समृद्धि आती है और व्यक्ति को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि इस व्रत का पालन करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
राजा बलि से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे दान में तीन पग भूमि मांगी। दो पग में भगवान ने धरती और आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। इससे भगवान ने देवताओं को उनका अधिकार वापस दिलाया और राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न हुए।
कैसे शुरू हुई चातुर्मास परंपरा?
भगवान विष्णु ने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा। तब बलि ने भगवान से पाताल लोक में रहने का आग्रह किया। बाद में माता लक्ष्मी ने गरीब महिला का रूप धारण कर बलि को राखी बांधी और भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन लिया। तब भगवान ने वरदान दिया कि वे हर साल चार महीने पाताल लोक में विश्राम करेंगे और कार्तिक शुक्ल एकादशी पर वैकुंठ लौटेंगे। यहीं से चातुर्मास की परंपरा शुरू हुई।
भक्ति का विशेष समय
चातुर्मास भले ही मांगलिक कार्यों के लिए शुभ न माना जाए, लेकिन यह पूजा-पाठ, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान भगवान विष्णु की आराधना करने से विशेष पुण्य मिलने की मान्यता है। इसलिए श्रद्धालु पूरे चार महीने नियम और भक्ति के साथ भगवान की पूजा करते हैं।