हरियाली तीज सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह सनातन धर्म का बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है, खासकर सुहागिन महिलाओं के लिए। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।
सबसे पहले किसने रखा था व्रत?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हरियाली तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने रखा था। उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कई जन्मों तक कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि माता पार्वती ने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
हरियाली तीज की शुरुआत कैसे हुई?
धार्मिक कथा के अनुसार, सावन शुक्ल तृतीया के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या स्वीकार की थी। इसी शुभ दिन दोनों का दिव्य मिलन हुआ। तभी से इस तिथि को हरियाली तीज के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह पर्व प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।
सुहागिन महिलाओं के लिए महत्व
हरियाली तीज का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही पति की आयु लंबी होती है और दांपत्य जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि बनी रहती है।
कुंवारी कन्याओं को क्या मिलता है?
हरियाली तीज केवल विवाहित महिलाओं का ही नहीं, बल्कि अविवाहित कन्याओं का भी प्रमुख व्रत है। धार्मिक विश्वास है कि श्रद्धा और सच्चे मन से व्रत रखने तथा शिव-पार्वती की पूजा करने से योग्य और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। इसलिए बड़ी संख्या में युवतियां भी इस दिन व्रत और पूजा करती हैं।
हरियाली तीज का संदेश
हरियाली तीज केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, निष्ठा और अटूट विश्वास का प्रतीक भी है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के आदर्श दांपत्य जीवन की याद दिलाता है। इसी कारण हर साल सावन में श्रद्धा और उत्साह के साथ यह व्रत मनाया जाता है और भक्त अपने सुखी वैवाहिक जीवन तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।