Iran War का नया असर! अब सड़कें बनना और गड्ढे भरना भी मुश्किल, जानिए क्यों बढ़ गया बिटुमेन का संकट

ईरान से जुड़े तनाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का असर अब सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी तक सीमित नहीं रहा। इसका असर सड़क निर्माण पर भी दिखाई देने लगा है। कई जगह नई सड़कें बनने की रफ्तार धीमी हो गई है और गड्ढों की मरम्मत का काम भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में बारिश के बाद सड़कों की हालत और खराब होने की आशंका बढ़ गई है।

सड़कें किससे बनती हैं?

अक्सर लोग सड़क बनाने वाले काले पदार्थ को तारकोल या कोलतार समझते हैं, लेकिन वास्तव में सड़कें बिटुमेन (Bitumen) से बनती हैं। यह कच्चे तेल को रिफाइन करने के बाद बचने वाला सबसे भारी और चिपचिपा हिस्सा होता है। यही पदार्थ पत्थर और बजरी को मजबूती से जोड़ता है, जिससे सड़क टिकाऊ बनती है। सड़कों की मरम्मत और गड्ढे भरने में भी बिटुमेन का ही इस्तेमाल होता है।

बिटुमेन की कमी क्यों हुई?

भारत को हर साल करीब 90 लाख टन बिटुमेन की जरूरत होती है, लेकिन देश में सिर्फ लगभग 54 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है। बाकी जरूरत का बड़ा हिस्सा इराक, यूएई, ईरान और ओमान जैसे देशों से आयात किया जाता है। इन देशों से आने वाला बिटुमेन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने से सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे बाजार में इसकी कमी हो गई है।

दाम भी हो गए दोगुने

युद्ध और सप्लाई की कमी का असर कीमतों पर भी पड़ा है। पहले बिटुमेन की कीमत करीब 40 हजार रुपये प्रति टन थी, जो अब बढ़कर लगभग 80 हजार रुपये प्रति टन पहुंच गई है। इससे सड़क निर्माण की लागत काफी बढ़ गई है। पुराने रेट पर ठेका लेने वाले ठेकेदारों के लिए अब काम जारी रखना मुश्किल हो गया है।

सड़क निर्माण क्यों धीमा पड़ा?

बिटुमेन महंगा होने और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने के कारण कई राज्यों में सड़क निर्माण और मरम्मत का काम धीमा पड़ गया है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत काम करने वाले छोटे ठेकेदार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। वहीं कई हाईवे परियोजनाओं की रफ्तार भी कम हुई है, हालांकि संबंधित एजेंसियां सप्लाई बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।

क्या इसका कोई समाधान है?

भारत ने धान के भूसे से बायो-बिटुमेन बनाने की दिशा में काम शुरू किया है और इसका उत्पादन भी शुरू हो चुका है। हालांकि अभी इसकी मात्रा बहुत कम है और देश की जरूरत पूरी करने के लिए पारंपरिक बिटुमेन पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है। ऐसे में यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा चलता है, तो सड़क निर्माण और मरम्मत की चुनौतियां कुछ समय तक बनी रह सकती हैं।

The Hindi Post
Author: The Hindi Post