हिंदू धर्म में समय को चार युगों- सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में बांटा गया है। वर्तमान समय को कलियुग माना जाता है। कई पुराणों में इस युग की विशेषताओं का वर्णन मिलता है। शिव पुराण में भी बताया गया है कि जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे समाज और इंसान के स्वभाव में बड़े बदलाव दिखाई देंगे।
धर्म से दूर होता इंसान
शिव पुराण के विद्याश्वर संहिता में महर्षि सूत और ऋषियों के संवाद के माध्यम से कलियुग का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि इस युग में धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे कम होगा। लोग सत्य का साथ छोड़कर झूठ, छल, लोभ और स्वार्थ की राह पर चलने लगेंगे। दूसरों की संपत्ति और सुख देखकर ईर्ष्या भी बढ़ेगी।
बढ़ेगा हिंसा और स्वार्थ
शिव पुराण के अनुसार, कलियुग में लोगों का स्वभाव अधिक हिंसक और स्वार्थी होता जाएगा। मनुष्य केवल शरीर को ही सब कुछ मानने लगेगा और आध्यात्मिक सोच कमजोर पड़ जाएगी। नास्तिकता बढ़ेगी, अच्छे संस्कार कम होंगे और माता-पिता के प्रति सम्मान भी पहले जैसा नहीं रहेगा। इससे परिवारों में दूरियां बढ़ सकती हैं।
समाज के हर वर्ग पर असर
शिव पुराण के अनुसार, कलियुग का असर समाज के सभी वर्गों पर पड़ेगा। ब्राह्मण धर्म और वेदों के अध्ययन से दूर होकर ज्ञान का उपयोग केवल आजीविका के लिए करेंगे। क्षत्रिय अपने कर्तव्यों और नैतिकता से भटक सकते हैं, जबकि वैश्य धन कमाने के लिए गलत रास्तों का सहारा लेने लगेंगे। इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा।
कर्तव्य भूलने से होगा पतन
ग्रंथ में बताया गया है कि जब लोग अपने कर्तव्यों और धर्म का पालन छोड़ देंगे, तब समाज में स्वार्थ, ईर्ष्या, अहंकार और लालच बढ़ने लगेगा। इसका असर सामाजिक रिश्तों, नैतिक मूल्यों और आपसी विश्वास पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि धर्म और सदाचार को जीवन का आधार माना गया है।
कलियुग का अंत कब होगा?
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्ष मानी गई है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत को अभी लगभग 5,000 वर्ष ही हुए हैं। यानी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलियुग समाप्त होने में अभी लाखों वर्ष का समय बाकी है। यह समय-सीमा आस्था और पुराणों में वर्णित मान्यताओं पर आधारित है।