अमेरिका की न्यूज़ एजेंसी Bloomberg की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान एक ऐसे सैन्य संगठन को बनाने की कोशिश में है, जिसे “इस्लामी NATO” कहा जा रहा है। इसका मक़सद मुस्लिम देशों को एक साझा सुरक्षा मंच पर लाना है। यानी अगर इस संगठन के किसी एक देश पर हमला होता है, तो बाकी सदस्य देश भी उसे अपने ऊपर हमला मानेंगे और मिलकर जवाब देंगे। ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका की अगुवाई वाले NATO में होता है।
सऊदी-पाकिस्तान समझौते से बढ़ी चर्चा
करीब सात महीने पहले पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग को लेकर बड़ा समझौता हुआ था। इसके बाद चर्चा तेज हो गई कि पाकिस्तान मुस्लिम देशों का नया सुरक्षा गठबंधन तैयार कर रहा है। पाकिस्तान परमाणु शक्ति वाला देश है, इसलिए माना जा रहा था कि इस समझौते के बाद सऊदी अरब की सुरक्षा और मजबूत होगी। हालांकि ईरान-सऊदी तनाव के दौरान सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए थे, लेकिन उस समय पाकिस्तान ने अपनी सेना नहीं भेजी थी।
तुर्की और क़तर भी हो सकते शामिल
अब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संकेत दिए हैं कि इस रक्षा गठबंधन में क़तर और तुर्की भी शामिल हो सकते हैं। तुर्की पहले से ही अमेरिका के नेतृत्व वाले NATO का सदस्य है, लेकिन इसके बावजूद वह मुस्लिम देशों के अलग सुरक्षा मंच में भी भूमिका निभा सकता है। पाकिस्तान का मानना है कि पश्चिम एशिया में हाल के युद्धों और बढ़ते तनाव के बाद मुस्लिम देश अब सुरक्षा मामलों में साथ आना चाहते हैं।
पश्चिम एशिया में बदल रहे रणनीतिक हालात
पाकिस्तान का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया के हालात तेजी से बदले हैं। ईरान, इज़रायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने कई देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान खुद को मुस्लिम दुनिया के सैन्य नेतृत्व के रूप में पेश करना चाहता है। अगर सऊदी अरब, तुर्की, क़तर और पाकिस्तान जैसे देश एक मंच पर आते हैं, तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को बड़ा असर पहुंचा सकता है।