कान्स फिल्म फेस्टिवल का आगाज फ्रांस के खूबसूरत शहर कान्स में हो चुका है। दुनिया के सबसे बड़े फिल्म समारोह में इस साल 22 फिल्मों को ‘मेन कॉम्पिटिशन’ सेक्शन में चुना गया है, लेकिन इनमें एक भी भारतीय फिल्म शामिल नहीं है। यही वो सेक्शन है जहां से सबसे प्रतिष्ठित ‘पाम डी ओर’ अवॉर्ड दिया जाता है। ऐसे में भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए यह खबर काफी निराशाजनक मानी जा रही है।
पिछले साल बढ़ी थीं बड़ी उम्मीदें
साल 2024 भारतीय सिनेमा के लिए बेहद खास रहा था। पायल कपाडिया की फिल्म All We Imagine as Light ने 30 साल बाद मेन कॉम्पिटिशन में जगह बनाई थी और ‘ग्रैंड प्रिक्स’ जीतकर इतिहास रच दिया था। इससे पहले 1994 में शाजी एन. करुण की फिल्म स्वहम इस सेक्शन तक पहुंची थी। ऐसे में उम्मीद थी कि भारतीय फिल्मों की मौजूदगी अब लगातार बनी रहेगी, लेकिन 2026 में फिर भारत खाली हाथ रह गया।
कान्स में भारत का पुराना इतिहास
भारतीय फिल्मों का कान्स से रिश्ता काफी पुराना है। चेतन आनंद की फिल्म Neecha Nagar ने 1946 में सबसे बड़ा सम्मान जीता था। सत्यजीत रे की पथेर पांचाली और बिमल रॉय की दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया। हालांकि मेन कॉम्पिटिशन में भारतीय फिल्मों की मौजूदगी हमेशा बहुत कम रही है।
दूसरे सेक्शन में दिखेगा भारतीय रंग
हालांकि इस साल भारत पूरी तरह गायब नहीं है। एफटीआईआई छात्रा मेहर मल्होत्रा की पंजाबी फिल्म ‘शैडोज ऑफ मूनलेस नाइट’ को ‘ला सिनेफ’ सेक्शन में जगह मिली है। वहीं मलयालम क्लासिक अम्मा अरियान को 4K रिस्टोर वर्जन में ‘कान्स क्लासिक्स’ में दिखाया जाएगा। इसके अलावा ‘सितंबर 21’ और ‘चढ़दीकला’ जैसी भारतीय फिल्में भी अलग-अलग स्क्रीनिंग और मार्केट सेक्शन में हिस्सा ले रही हैं। यानी मेन रेस में भले भारत न हो, लेकिन भारतीय सिनेमा की मौजूदगी अब भी बनी हुई है।