सनातन धर्म में आरती पूजा का बेहद अहम हिस्सा मानी जाती है और इसके बिना पूजा अधूरी समझी जाती है। धूप, दीप और प्रसाद अर्पित करने के बाद आरती की जाती है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। आरती की लौ सिर्फ रोशनी नहीं होती, बल्कि यह ईश्वर की दिव्य उपस्थिति और आशीर्वाद का संकेत मानी जाती है। मान्यता है कि यह अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
कपूर का विशेष महत्व और प्रतीक
आरती में कपूर का उपयोग खास महत्व रखता है। यह पूरी तरह जलकर खत्म हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार और सांसारिक इच्छाओं के त्याग का प्रतीक है। इसका संदेश यह है कि मनुष्य को अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर में लीन होना चाहिए। वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध करने और कीटाणुओं को कम करने में भी मदद करती है।
आरती करने की सही विधि
आरती करने की एक पारंपरिक विधि होती है, जिसमें कपूर या दीपक को जलाकर भगवान की मूर्ति के सामने घुमाया जाता है। इसे चरण, नाभि और मुख के पास घुमाकर पूरी मूर्ति को प्रकाश से प्रकाशित किया जाता है। कई लोग बीच में ज्वाला बुझने से बचाने के लिए अतिरिक्त कपूर भी रखते हैं। अंत में आरती की लौ को आंखों से लगाकर आशीर्वाद लिया जाता है। परंपराओं में एका आरती और पंच आरती जैसे प्रकार भी बताए गए हैं।
कपूर बुझना अशुभ है या सामान्य बात
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल होता है कि आरती के दौरान कपूर बुझ जाए तो क्या यह अशुभ संकेत है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। कपूर का बुझना हवा, नमी या उसकी गुणवत्ता जैसे सामान्य कारणों से हो सकता है। इसे किसी तरह का अपशगुन नहीं माना जाता। ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि श्रद्धा के साथ कपूर को दोबारा जलाकर आरती पूरी करनी चाहिए। ईश्वर भाव और भक्ति को महत्व देते हैं, न कि छोटी घटनाओं को।