Stop Oil, Stop Money! क्या नाकेबंदी से घुटनों पर आ जाएगा ईरान, ट्रंप के दावे पर बड़ा सवाल

अमेरिका ने ईरान के तेल कारोबार पर दबाव बनाने के लिए समुद्री नाकेबंदी जैसी रणनीति अपनाई है। इसका असर यह हुआ कि ईरान अपना तेल आसानी से निर्यात नहीं कर पा रहा। रोज़ाना निकलने वाला अतिरिक्त तेल अब स्टोरेज में जमा हो रहा है। यही स्थिति ट्रंप के बयान की पृष्ठभूमि बनती है।

ट्रंप का ‘कुएं फटने’ वाला दावा

डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान तेल बाहर नहीं भेज पाया, तो स्टोरेज भरने के बाद कुएं फट सकते हैं। उनका तर्क है कि जमीन के अंदर दबाव लगातार बना रहता है और तेल निकलता रहेगा। ऐसे में अगर निकासी रुक गई तो दबाव बढ़ेगा और नुकसान हो सकता है।

तेल कुएं कैसे काम करते हैं

असल में तेल जमीन के बहुत नीचे चट्टानों के बीच दबाव में फंसा होता है। जब कुआं खोदा जाता है, तो वही दबाव तेल को ऊपर लाता है। शुरुआत में तेल तेज़ी से निकलता है, लेकिन समय के साथ दबाव कम हो जाता है। इसलिए कई पुराने कुओं में पंप या अन्य तकनीकों से तेल निकाला जाता है।

क्या वाकई कुएं फट सकते हैं?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तेल कुओं के “फटने” की संभावना बेहद कम है। कुएं में वाल्व और कंट्रोल सिस्टम होते हैं, जिनसे फ्लो रोका या कम किया जा सकता है। अगर उत्पादन रोका जाए, तो नुकसान हो सकता है- जैसे दबाव संतुलन बिगड़ना या पानी भरना, लेकिन विस्फोट जैसी स्थिति सामान्य नहीं होती।

ईरान की असली चुनौती क्या है

ईरान रोज़ाना करीब 30 लाख बैरल तेल निकालता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए होता है। नाकेबंदी के कारण यही तेल स्टोरेज में जमा हो रहा है। जमीन और समुद्र में मौजूद टैंकों की क्षमता सीमित है। अगर ये भर गए, तो ईरान को उत्पादन घटाना या बंद करना पड़ सकता है, जिससे आर्थिक नुकसान बढ़ेगा।

रणनीति: दबाव बनाकर समझौता

अमेरिका की रणनीति साफ दिखती है- ईरान की कमाई रोककर उसे बातचीत के लिए मजबूर करना। तेल निर्यात रुकने से उसकी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। हालांकि “कुएं फटने” वाली बात ज्यादा राजनीतिक बयान मानी जा रही है, लेकिन आर्थिक दबाव असली हथियार है।

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Author: The Hindi Post