अमेरिका और ईरान के बीच भले ही जंग और सीजफायर की चर्चा रही हो, लेकिन असली रणनीतिक मुकाबला अमेरिका और चीन के बीच ही माना जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप भले जीत का दावा कर रहे हों, लेकिन दुनिया के कई देश और खुद अमेरिका के भीतर भी लोग इस दावे से सहमत नहीं दिखते। “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का वादा इस जंग के बाद सवालों में घिरता नजर आ रहा है।
सहयोगी देशों का भरोसा डगमगाया
अमेरिका के सहयोगी देशों, खासकर खाड़ी और यूरोपीय देशों को इस जंग में बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। जिन देशों ने अमेरिका को अपने यहां सैन्य अड्डे बनाने दिए, उन्हें हमलों का सामना करना पड़ा लेकिन बदले में ठोस सुरक्षा नहीं मिल पाई। NATO के देशों ने भी नाराजगी जताई कि उनसे बिना चर्चा के फैसले लिए गए। इससे अमेरिका पर भरोसा पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।
चीन की छवि को मिला बड़ा फायदा
इस पूरे घटनाक्रम में चीन को अप्रत्यक्ष फायदा हुआ है। पहले जहां चीन पर कर्ज के जाल में फंसाने के आरोप लगते थे, अब कई देशों को वह ज्यादा स्थिर विकल्प नजर आने लगा है। रूस के साथ उसकी नजदीकी भी कई देशों को आकर्षित कर रही है। चीन ने शांति की पहल कर खुद को जिम्मेदार शक्ति के रूप में पेश किया, जिससे उसकी वैश्विक छवि मजबूत हुई है।
छोटे देशों की बदलती रणनीति
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई छोटे देश अब नई रणनीति पर विचार कर रहे हैं। जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। वहीं सऊदी अरब और अफ्रीकी देश चीन के साथ निवेश और परियोजनाओं में तेजी दिखा रहे हैं। अब कई देशों को लगने लगा है कि अमेरिका के साथ अस्थिरता का जोखिम है, जबकि चीन के साथ कम से कम स्थिरता और विकास के मौके मिल सकते हैं।