ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच चल रहे युद्ध को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जीत किसकी होगी. लेकिन इतिहास बताता है कि युद्ध जीतना और फायदे में रहना दोनों अलग चीजें हैं. कई बार जो देश जीतता है, वह आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर भी हो जाता है. वहीं कोई तीसरा या चौथा देश इस स्थिति का फायदा उठाकर मजबूत बन जाता है.
इतिहास से मिलती सीख
दूसरे विश्व युद्ध का उदाहरण इसे साफ करता है. उस समय ब्रिटेन युद्ध जीतने वाले देशों में था, लेकिन युद्ध के खर्च ने उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया. इसके उलट अमेरिका युद्ध के अंत तक सबसे ताकतवर बनकर उभरा. उसने हथियार और संसाधन सप्लाई कर आर्थिक ताकत बढ़ाई और बाद में सुपरपावर बन गया. यानी जीत के बावजूद ब्रिटेन कमजोर हुआ और अमेरिका सबसे आगे निकल गया.
मौजूदा युद्ध में कौन उलझा
आज के हालात में अमेरिका और इज़राइल सीधे युद्ध में शामिल हैं और भारी खर्च कर रहे हैं. हथियार, मिसाइल और सैन्य संसाधनों पर अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं. अगर यह युद्ध लंबा चलता है, तो अमेरिका की आर्थिक और सैन्य ताकत पर दबाव बढ़ सकता है. वहीं रूस पहले से ही यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है, जिससे उसकी स्थिति भी पूरी तरह मजबूत नहीं मानी जा रही.
चीन की रणनीतिक चाल
इस पूरे संघर्ष में सबसे दिलचस्प भूमिका चीन की मानी जा रही है. चीन सीधे युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन वह ईरान से सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है. प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने अपने तरीके से व्यापार जारी रखा है. इसके अलावा वह मध्य पूर्व के कई देशों में निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है.
खाड़ी देशों पर असर
ईरान युद्ध का असर खाड़ी देशों पर भी पड़ रहा है. अब ये देश सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि अमेरिका के साथ जुड़ना उनके लिए कितना फायदेमंद है. चीन पहले से ही सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों में निवेश कर चुका है. ऐसे में भविष्य में इन देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन बदल सकता है.
कौन बनेगा असली विजेता
इस युद्ध में जीत चाहे किसी की भी हो, असली फायदा उस देश को मिल सकता है जो सीधे युद्ध से दूर रहकर अपनी ताकत बढ़ा रहा है. मौजूदा हालात को देखते हुए चीन इस भूमिका में नजर आता है. इतिहास भी यही बताता है कि कई बार लड़ाई में शामिल देशों से ज्यादा फायदा बाहर बैठा खिलाड़ी उठाता है.