ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की सप्लाई पर खतरा बढ़ा है, जिससे भारत में एथेनॉल की चर्चा तेज हो गई है। अभी देश में E20 पेट्रोल यानी 20% एथेनॉल मिलाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या इसे और बढ़ाकर 100% एथेनॉल तक ले जाया जा सकता है।
एथेनॉल से क्या हो रहा फायदा
एथेनॉल मिलाने से भारत की विदेशी तेल पर निर्भरता कम हुई है। पिछले 10 साल में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है। हर साल करीब 4.5 करोड़ बैरल तेल कम आयात करना पड़ रहा है। इसके अलावा प्रदूषण भी घटा है, जिससे पर्यावरण को फायदा हुआ है।
कितनी है उत्पादन क्षमता और मांग
भारत में एथेनॉल गन्ना, मक्का और चावल से बनाया जा रहा है। अभी देश की उत्पादन क्षमता करीब 2000 करोड़ लीटर है, जबकि जरूरत करीब 1100 करोड़ लीटर की है। इसलिए एथेनॉल उद्योग चाहता है कि इसे 20% से बढ़ाकर 27% या उससे ज्यादा किया जाए।
100% एथेनॉल पर क्या हैं चुनौतियां
पूरी तरह एथेनॉल पर चलने के लिए फ्लेक्स फ्यूल इंजन वाली गाड़ियां जरूरी होंगी। मौजूदा गाड़ियों में ज्यादा एथेनॉल से माइलेज और इंजन को नुकसान की शिकायतें सामने आती हैं। साथ ही, नए इंजन और अलग फ्यूल सिस्टम से गाड़ियां महंगी हो सकती हैं।
खेती और पानी पर बड़ा असर
अगर एथेनॉल की मांग बढ़ेगी तो किसान गन्ना, धान और मक्का ज्यादा उगाएंगे। ये फसलें ज्यादा पानी लेती हैं, जिससे भूजल स्तर गिर सकता है। साथ ही दाल और तिलहन की खेती कम होगी, जिससे खाने के तेल और दाल का आयात बढ़ सकता है।
सरकार के सामने संतुलन बनाने की चुनौती
सरकार के सामने चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ तेल आयात कम करना जरूरी है, तो दूसरी तरफ खेती और पर्यावरण भी बचाना है। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहन की तरफ भी तेजी से बढ़ना एक बड़ा विकल्प है। आने वाले समय में भारत को इन सभी विकल्पों के बीच सही संतुलन बनाना होगा।