फ़ारस की खाड़ी के किनारे सऊदी अरब, कुवैत, क़तर, बहरीन और UAE जैसे बड़े तेल उत्पादक देश स्थित हैं। इन देशों का अधिकांश तेल समुद्री जहाज़ों से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। लेकिन समस्या यह है कि फ़ारस की खाड़ी से बाहर निकलने का मुख्य रास्ता एक ही है- हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य। यह समुद्री मार्ग बहुत संकरा है और इसके एक किनारे पर ईरान स्थित है। ऐसे में अगर युद्ध या तनाव की स्थिति बने तो ईरान इस रास्ते को रोककर वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर डाल सकता है।
क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं बनाया गया?
यह सवाल अक्सर उठता है कि इतने अमीर तेल उत्पादक देशों ने हॉर्मुज़ का विकल्प क्यों नहीं बनाया। दरअसल इस पर काफी पहले से सोच-विचार किया गया था और कुछ वैकल्पिक व्यवस्था भी बनाई गई। समुद्री रास्ते की जगह जमीन के रास्ते तेल ले जाने के लिए पाइपलाइनें बनाई गईं। इन पाइपलाइनों का उद्देश्य यह था कि तेल को सीधे किसी ऐसे बंदरगाह तक पहुंचा दिया जाए जो हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर न गुजरता हो। इससे जहाज़ सीधे खुले समुद्र में निकल सकें और जोखिम कम हो।
सऊदी और UAE की पाइपलाइन रणनीति
सऊदी अरब ने इसके लिए लगभग 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बनाई। यह पूर्वी सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों से तेल लेकर पश्चिम में लाल सागर के किनारे स्थित यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। इसकी क्षमता रोज़ करीब 50 लाख बैरल तेल ले जाने की है। इसी तरह UAE ने हबशान-फुजैराह पाइपलाइन बनाई, जो करीब 400 किलोमीटर लंबी है और रोज़ाना लगभग 15 से 18 लाख बैरल तेल ओमान की खाड़ी के किनारे फुजैराह बंदरगाह तक पहुंचा सकती है। इस तरह दोनों पाइपलाइनें मिलकर हॉर्मुज़ को समुद्री रास्ते से बायपास करने की कोशिश करती हैं।
फिर भी क्यों नहीं खत्म हुई निर्भरता
सबसे बड़ी समस्या इन पाइपलाइनों की सीमित क्षमता है। आम दिनों में फ़ारस की खाड़ी से लगभग 2 करोड़ बैरल तेल रोज़ाना दुनिया भर में जाता है। लेकिन सऊदी और UAE की पाइपलाइनें मिलकर अधिकतम करीब 65 लाख बैरल ही पहुंचा सकती हैं, जबकि बंदरगाहों की वास्तविक लोडिंग क्षमता इससे भी कम है। इसके अलावा लंबा समुद्री रास्ता, अतिरिक्त लागत और युद्ध के दौरान पाइपलाइनों पर हमले का खतरा भी बना रहता है। इसलिए ये वैकल्पिक रास्ते कुछ राहत तो देते हैं, लेकिन हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की जगह पूरी तरह नहीं ले पाते।